कानून क्या कहता है?
भारत में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों को “वरिष्ठ नागरिक” और 80 वर्ष से ऊपर के लोगों को “अति वरिष्ठ नागरिक” माना जाता है। इनकी भलाई और अधिकारों की रक्षा के लिए भारत सरकार ने मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटिज़न्स एक्ट, 2007 लागू किया है। इसके अलावा नेशनल पॉलिसी फॉर ओल्डर पर्सन्स भी बनाई गई है जो बुजुर्गों को वित्तीय, चिकित्सीय और सामाजिक सुरक्षा देने का वादा करती है।
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संपत्ति छीनने का मिलता है कानूनी हक
इस कानून का मुख्य उद्देश्य यही है कि कोई भी बुज़ुर्ग अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में बेसहारा और तन्हा महसूस न करे। यदि कोई बुज़ुर्ग आर्थिक रूप से निर्भर है या शारीरिक रूप से कमजोर है, तो उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी उसके बच्चों या वारिसों की होती है। यदि वे इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ते हैं या बुज़ुर्गों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, तो वे अपने अधिकार खो सकते हैं।
बुज़ुर्ग माता-पिता अपने ही घर में अपमानित महसूस करें, इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं – कानून ने उन्हें अधिकार दिया है कि वे ऐसे बच्चों को अपनी संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं, जिसे उन्होंने कभी प्रेम और भरोसे से सौंपा था।
कोर्ट तक नहीं जाना पड़ता, है खास ट्राइब्यूनल
अगर किसी बुज़ुर्ग को यह महसूस होता है कि उसकी संपत्ति पर बच्चों ने धोखे से कब्जा कर लिया है या सेवा की शर्त पर मिली संपत्ति अब अपमान का कारण बन गई है, तो वह इसे वापस पाने के लिए कदम उठा सकता है। इसके लिए उन्हें किसी बड़े कोर्ट के चक्कर नहीं काटने होते, बल्कि सीनियर सिटिजन ट्राइब्यूनल में याचिका दायर करनी होती है।
ट्राइब्यूनल मामले की सुनवाई के बाद संपत्ति वापस देने और बेदखली जैसे आदेश पारित कर सकता है।
बदलता समाज, बदलती सोच
अब समय आ गया है कि हम बुज़ुर्गों को केवल श्रद्धा नहीं, हक और सुरक्षा भी दें। बच्चों के कर्तव्य केवल जन्म देने भर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जीवनभर सेवा और सम्मान देना भी उतना ही जरूरी है। कानून ने रास्ता दिखा दिया है – अब समाज को भी आगे बढ़कर बुज़ुर्गों की आवाज़ बनना होगा।
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