Delhi High Court: दिल्ली में एक अहम कानूनी मामले में Delhi High Court ने बड़ा फैसला सुनाया है, जो आम जनता और राजनीति दोनों के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिसमें कोर्ट ने साफ कहा है कि किसी मुख्यमंत्री द्वारा जनता से किए गए वादों को अदालत के आदेश से लागू नहीं कराया जा सकता।
जानकारी के लिए बता दें यह मामला उस समय का है जब कोरोना महामारी के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री Arvind Kejriwal ने किरायेदारों को राहत देने का आश्वासन दिया था। जिसमें कुछ लोगों ने इस वादे को पूरा करवाने के लिए कोर्ट का रुख किया, जिसके बाद यह मामला कानूनी बहस का विषय बन गया। अब ऐसे में हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे वादे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते, हालांकि सरकार चाहे तो इन पर नीति बना सकती है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला मार्च 2020 का है, जब देश में कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन लगा हुआ था। उस दौरान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मकान मालिकों से अपील की थी कि वे आर्थिक रूप से कमजोर किरायेदारों से किराया न मांगें। साथ ही यह भी कहा गया था कि यदि कोई किरायेदार किराया देने में असमर्थ होता है, तो सरकार उसकी मदद कर सकती है या उसके किराए का भुगतान कर सकती है। इस बयान के बाद कई लोगों को उम्मीद जगी कि सरकार उन्हें आर्थिक राहत देगी।
मजदूरों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया
दरअसल साल 2021 में कुछ दिहाड़ी मजदूरों और किरायेदारों ने इस वादे को लागू कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री द्वारा किया गया वादा सरकार की जिम्मेदारी बनता है, इसलिए इसे लागू किया जाना चाहिए। इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रतिभा एम सिंह की सिंगल बेंच ने की थी।
सिंगल बेंच का फैसला क्या था?
जुलाई 2021 में सिंगल बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से किया गया वादा एक तरह का आश्वासन होता है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा था कि सरकार को इस दिशा में एक ठोस नीति बनानी चाहिए, ताकि जरूरतमंद लोगों को राहत मिल सके। साथ ही यह निर्देश भी दिया गया था कि अगर सरकार ऐसी कोई नीति नहीं बनाती है, तो उसे इसके कारण बताने होंगे।
सरकार ने फैसले को दी चुनौती
दिल्ली सरकार ने सिंगल बेंच के इस आदेश को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में अपील दायर की है। सरकार का तर्क था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान को कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं माना जा सकता।
डिवीजन बेंच ने क्या कहा?
डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला शामिल थे, जिसमें कोर्ट ने सिंगल बेंच के फैसले को पलट दिया। जिसके बाद कोर्ट ने अपने फैसले में कहा।
- प्रेस कॉन्फ्रेंस में किए गए वादों को अदालत के आदेश के जरिए लागू नहीं कराया जा सकता।
- ऐसे वादे कई बार भावावेश या परिस्थितियों के दबाव में किए जाते हैं।
- अदालत यह तय नहीं कर सकती कि इन वादों को पूरा करने से सरकारी खजाने पर कितना असर पड़ेगा।
कोर्ट की सीमाएं भी बताईं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की अपनी सीमाएं होती हैं। अदालत नीति बनाने या आर्थिक फैसले लेने के लिए सरकार को बाध्य नहीं कर सकती। हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर मौजूदा सरकार चाहे, तो वह पूर्व मुख्यमंत्री के वादों के आधार पर कोई योजना या नीति बना सकती है। लेकिन इसके लिए अदालत कोई निर्देश नहीं दे सकती।

फैसले का क्या मतलब है?
दरअसल इस फैसले का सीधा मतलब है कि, राजनीतिक नेताओं द्वारा किए गए वादे हमेशा कानूनी रूप से लागू नहीं होते। जिसमें अदालत केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करती है, जहां स्पष्ट कानूनी अधिकार या उल्लंघन का मामला हो। वहीं, नीतिगत और आर्थिक फैसले सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
आम जनता पर क्या असर?
अब ऐसे में इस फैसले से आम लोगों को यह समझने की जरूरत है कि चुनावी वादे या प्रेस कॉन्फ्रेंस में किए गए ऐलान हमेशा कानूनी अधिकार नहीं बनते। हालांकि, सरकारें चाहें तो ऐसे वादों को योजनाओं में बदल सकती हैं, लेकिन इसके लिए अदालत उन्हें मजबूर नहीं कर सकती।
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