भारतीय रुपया: भारतीय रुपया सोमवार (6 अप्रैल 2026) को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत होकर खुला है। जिसमें रुपया 10 पैसे की बढ़त के साथ 93 के स्तर पर पहुंच गया है, जबकि इससे पहले 2 अप्रैल को यह 93.10 पर बंद हुआ था। यह मजबूती ऐसे समय आई है जब पिछले हफ्ते ही रुपये में करीब 1.8% की तेज़ उछाल दर्ज की गई थी, जो पिछले चार सालों में सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त मानी जा रही है। रुपये की इस मजबूती के पीछे मुख्य कारण भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा उठाए गए नए कदम हैं। इन उपायों का उद्देश्य करेंसी मार्केट में स्थिरता लाना और अनावश्यक सट्टेबाजी को रोकना है।
RBI के फैसलों से मिला सपोर्ट
भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल ही में बैंकों और कॉर्पोरेट्स के लिए पोजिशन लिमिट तय की है। इसका सीधा असर करेंसी मार्केट पर देखने को मिल रहा है। इस कदम का मकसद ऑनशोर और नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (NDF) मार्केट के बीच होने वाले आर्बिट्राज को खत्म करना है। दरअसल जब मार्केट में आर्बिट्राज के मौके कम होते हैं, तो अनावश्यक ट्रेडिंग घटती है और करेंसी स्थिर होती है। इसी वजह से बैंकों ने अपने डॉलर एक्सपोजर को कम करना शुरू कर दिया है और घरेलू बाजार में डॉलर बेच रहे हैं, जिससे रुपये को मजबूती मिल रही है।
RBI ने बैंकों को 10 अप्रैल तक नई लिमिट के अनुसार अपनी पोजिशन एडजस्ट करने के निर्देश दिए हैं। मार्केट के जानकारों का मानना है कि इस डेडलाइन तक रुपये को लगातार सपोर्ट मिलता रहेगा।
सट्टा गतिविधियों पर सख्ती
RBI ने केवल बैंकों पर ही नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट्स की सट्टा गतिविधियों पर भी कड़ा रुख अपनाया है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वे अपने क्लाइंट्स को NDF कॉन्ट्रैक्ट ऑफर न करें। इस कदम से यह साफ हो गया है कि RBI का फोकस रुपये को स्थिर रखने पर है। इससे मार्केट में अनिश्चितता कम होगी और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा।
किन वजहों से रुक सकती है तेजी?
अब ऐसे में रुपये में मजबूती दिख रही है, लेकिन कुछ बाहरी कारक इसकी आगे की बढ़त को रोक सकते हैं।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिल रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं। जिसमें भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने से देश का इंपोर्ट बिल बढ़ता है, जिससे रुपये पर दबाव आता है।
विदेशी निवेशकों की निकासी
विदेशी निवेशक (FII) लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। मार्च महीने में 12.5 बिलियन डॉलर से ज्यादा की निकासी हुई थी, जबकि 2 अप्रैल को भी करीब 1 बिलियन डॉलर का आउटफ्लो दर्ज किया गया। जिसमें विदेशी निवेशकों की यह निकासी रुपये के लिए नकारात्मक संकेत मानी जाती है, क्योंकि इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है।

बॉन्ड मार्केट में भी सुधार
दरअसल रुपये के साथ-साथ भारतीय बॉन्ड मार्केट में भी हल्की रिकवरी देखने को मिली है। 6 अप्रैल को बॉन्ड यील्ड में 2 बेसिस पॉइंट्स (bps) की गिरावट आई, जिससे पिछले सत्र के नुकसान की आंशिक भरपाई हुई। बेंचमार्क 10 साल का सरकारी बॉन्ड यील्ड 7.1130% पर आ गया, जो पहले 7.1329% था। यह संकेत देता है कि निवेशकों का भरोसा धीरे-धीरे लौट रहा है।
राज्य सरकारों की कम उधारी से राहत
RBI ने जानकारी दी है कि राज्य सरकारें इस बार उम्मीद से कम उधारी लेने की योजना बना रही हैं। डेट ऑक्शन के जरिए 18,159 करोड़ रुपये जुटाने की योजना है।इसके अलावा अप्रैल-जून तिमाही में राज्य सरकारें करीब 2.54 लाख करोड़ रुपये जुटा सकती हैं, जो पहले के अनुमान 3 लाख करोड़ रुपये से कम है। इससे बॉन्ड मार्केट पर दबाव कम होगा और यील्ड स्थिर रह सकती है।
ग्लोबल फैक्टर्स का असर
वैश्विक स्तर पर भी कई घटनाएं भारतीय बाजार को प्रभावित कर रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को लेकर सख्त रुख अपनाया है और होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की चेतावनी दी है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में और तेजी आ सकती है। युद्ध जैसे हालात के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें $110 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं।
अब आगे क्या रहेगा रुख?
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि RBI के कदमों से शॉर्ट टर्म में रुपये को सपोर्ट मिलता रहेगा। हालांकि, लंबे समय में रुपये की दिशा ग्लोबल फैक्टर्स पर निर्भर करेगी। खास तौर पर तेल की कीमतें, विदेशी निवेश और वैश्विक राजनीतिक हालात रुपये की चाल तय करेंगे। अगर तेल की कीमतें और बढ़ती हैं या विदेशी निवेशकों की निकासी जारी रहती है, तो रुपये पर दबाव फिर से बढ़ सकता है।



