Mohan Bhagwat Statement: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मुंबई में RSS के शताब्दी वर्ष समारोह में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर अपने विचार रखे। दरअसल, उन्होंने संघ की भूमिका, स्वयंसेवकों की जिम्मेदारियां और अपने पद के बारे में खुलकर बात की है। जिसमें उनका कहना है कि, संघ का उद्देश्य केवल प्रचार करना नहीं है, बल्कि समाज में संस्कार और अनुशासन विकसित करना भी है। साथ ही, हम विश्व गुरु बनेंगे, लेकिन यह सिर्फ भाषणों से नहीं होगा। यह हमें अपने उदाहरणों से साबित करना होगा। वहीं, अगर आप भारतीय हैं, तो यह हुनर आपको विरासत में मिला है। जिसमें भारत के मुस्लिम और ईसाई भी भारत के ही हैं। साथ ही, उन्होंने अपने विचारों में देश और समाज की एकता पर जोर दिया।
RSS में पद और उम्र का महत्व
दरअसल,मोहन भागवत का कहना है कि संघ ने उन्हें उनकी उम्र के बावजूद काम जारी रखने की अनुमति दी है। अब मैं 75 साल का हो गया हूं और संघ को इसका पता है। संघ ने मुझे पद पर रहकर काम जारी रखने को कहा है, लेकिन अगर संघ मुझे पद छोड़ने के लिए कहेगा, मैं तुरंत ऐसा करूंगा। साथ ही, संघ अपने स्वयंसेवकों से आखिरी बूंद तक काम लेता है और अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी को जबरदस्ती रिटायर किया गया हो। साथ ही, संघ में आमतौर पर 75 साल की उम्र के बाद कोई पद नहीं रखा जाता, लेकिन काम से रिटायरमेंट नहीं होती। जिसमें उन्होंने यह भी कहा कि संघ का शीर्ष पद यानी सरसंघचालक बनने के लिए जाति कोई बाधा नहीं है। किसी भी हिंदू जाति का व्यक्ति संघ के सर्वोच्च पद के लिए योग्य हो सकता है।
संघ का उद्देश्य, समाज में संस्कार
भागवत ने कहा कि संघ का काम केवल प्रचार करना नहीं है, बल्कि समाज में संस्कार विकसित करना है। उन्होंने बताया कि जरूरत से ज्यादा प्रचार दिखावा और अहंकार को जन्म देता है। उनका मानना है कि प्रचार बारिश की तरह होना चाहिए, सही समय पर और सीमित मात्रा में। जिसमें संघ ने पहले से ही तय किया है कि संपूर्ण समाज को संगठित करना ही इसका मुख्य काम है। इसे छोड़कर संघ को किसी और काम में नहीं लगाना चाहिए।
संघ और राजनीति
RSS प्रमुख ने संघ और राजनीति के बीच के अंतर पर भी स्पष्ट किया। संघ स्वयं एक राजनीतिक संगठन नहीं है। संघ का काम समाज को संगठित करना है। जिसमें कई लोग सोचते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RSS के प्रधानमंत्री हैं, जबकि बीजेपी एक अलग राजनीतिक पार्टी है। उन्होंने यह भी कहा कि बीजेपी में कई प्रभावशाली स्वयंसेवक हैं, लेकिन संघ और पार्टी अलग हैं।

हिंदू पहचान और गर्व
भागवत ने हिंदू पहचान के चार प्रकार बताए। उन्होंने कहा कि कुछ लोग गर्व से कहते हैं कि वे हिंदू हैं। कुछ लोग इसे मामूली समझते हैं और कहते हैं कि इसमें गर्व की कोई बात नहीं। तीसरे प्रकार के लोग धीरे से अपनी पहचान बताते हैं, जबकि चौथे प्रकार के लोग या तो अपनी हिंदू पहचान भूल गए हैं या उन्हें इसे भूलने के लिए मजबूर किया गया है। दरअसल, हिंदू पहचान और उसके प्रति गर्व को समझना जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि यह केवल धार्मिक पहचान नहीं है, बल्कि संस्कृति और परंपरा से जुड़ा हुआ है।
पद छोड़ने की स्थिति
मोहन भागवत ने कहा है कि संघ में किसी भी पद से हटने की अंतिम जिम्मेदारी संगठन पर है। अगर संघ मुझे पद छोड़ने के लिए कहेगा, तो मैं तुरंत ऐसा करूंगा, लेकिन काम से कभी रिटायर नहीं होऊंगा। उनका यह बयान संघ में अनुशासन और संगठन के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है।
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