Nandita Garlosa: असम की राजनीति में चुनाव से ठीक पहले बड़ा राजनीतिक उलटफेर देखने को मिला है. राज्य सरकार में मंत्री रहीं Nandita Garlosa ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है. यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और टिकट वितरण को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो चुकी है. बताया जा रहा है कि BJP से टिकट न मिलने के बाद उन्होंने यह बड़ा कदम उठाया.
कौन हैं नंदिता गरलोसा?
Nandita Garlosa असम की एक प्रमुख जनजातीय नेता मानी जाती हैं. 2021 में BJP के टिकट पर विधायक चुनी गईं. Haflong (ST सीट) का प्रतिनिधित्व किया, असम सरकार में मंत्री रहीं और खान एवं खनिज और जनजातीय आस्था एवं संस्कृति विभाग संभाला. उनकी पहचान एक मजबूत और जमीनी नेता के रूप में रही है, खासकर दिमा हसाओ क्षेत्र में उनका प्रभाव काफी माना जाता है.
सूत्रों के अनुसार, इस बार विधानसभा चुनाव के लिए BJP ने उन्हें टिकट नहीं दिया. टिकट न मिलने से नाराजगी, पार्टी नेतृत्व से मतभेद और राजनीतिक भविष्य को लेकर असमंजस.इन कारणों के चलते उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला किया.
कांग्रेस में शामिल होने का फैसला
नंदिता गरलोसा ने कांग्रेस में शामिल होकर सभी को चौंका दिया. Indian National Congress ने उनके शामिल होने की पुष्टि करते हुए कहा कि, वह पिछले 5 वर्षों से दिमा हसाओ की मजबूत आवाज रही हैं. अपने सिद्धांतों पर हमेशा कायम रहीं और जनता के हित में काम किया. वहीं,कांग्रेस ने उन्हें तुरंत चुनावी मैदान में उतारने का फैसला भी किया.
हाफलोंग सीट से चुनाव लड़ेंगी
नंदिता गरलोसा अब हाफलोंग सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ेंगी. दिलचस्प बात यह है कि इस सीट पर पहले कांग्रेस ने निर्मल लंगथासा को उम्मीदवार बनाया था पर बाद में उन्होंने गरलोसा के समर्थन में अपनी उम्मीदवारी छोड़ दी. यह कदम कांग्रेस की रणनीति को दर्शाता है कि पार्टी मजबूत उम्मीदवारों पर दांव खेल रही है.
BJP पर लगाए गए आरोप
कांग्रेस ने इस मौके पर BJP और मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma पर निशाना भी साधा. पार्टी का आरोप है कि आदिवासी हितों की अनदेखी की जा रही है. जमीन से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज किया गया और बड़े कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता दी गई. हालांकि, इन आरोपों पर BJP की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है.
असम चुनाव 2026 पर क्या असर पड़ेगा?
नंदिता गरलोसा के इस फैसले का असर चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है. जैसे, दिमा हसाओ क्षेत्र में कांग्रेस मजबूत हो सकती है. जनजातीय वोट बैंक में बदलाव संभव हो सकता है. और BJP को स्थानीय स्तर पर चुनौती मिल सकती है. वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक नेता का पार्टी बदलना नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है.
दिमा हसाओ की राजनीति में बढ़ेगा असर
दिमा हसाओ जैसे जनजातीय बहुल इलाके में किसी बड़े नेता का पार्टी बदलना सिर्फ व्यक्तिगत फैसला नहीं होता, बल्कि इसका सीधा असर स्थानीय राजनीति पर पड़ता है. नंदिता गरलोसा का यहां मजबूत जनाधार रहा है और उनके समर्थकों की संख्या भी काफी मानी जाती है. ऐसे में उनका कांग्रेस में जाना इस क्षेत्र में राजनीतिक समीकरण बदल सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से कांग्रेस को जमीनी स्तर पर मजबूती मिल सकती है, खासकर उन इलाकों में जहां पार्टी पहले कमजोर मानी जाती थी. वहीं, BJP को अपने संगठन और रणनीति को और मजबूत करना पड़ सकता है.
जनजातीय राजनीति में नया समीकरण
असम की राजनीति में जनजातीय समुदाय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है. दिमा हसाओ और आसपास के क्षेत्रों में जनजातीय वोट निर्णायक माने जाते हैं.
गरलोसा की पकड़ जनजातीय समाज में मजबूत, स्थानीय मुद्दों पर उनकी सक्रियता और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति. इन सभी कारणों से यह बदलाव केवल एक सीट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र में असर डाल सकता है.
क्या कांग्रेस को मिलेगा फायदा?
कांग्रेस लंबे समय से असम में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में नंदिता गरलोसा जैसे नेता का शामिल होना पार्टी के लिए एक बड़ा अवसर माना जा रहा है.
- मजबूत स्थानीय चेहरा मिला
- संगठन को नई ऊर्जा
- चुनावी मुकाबला हुआ दिलचस्प
हालांकि, यह देखना भी जरूरी होगा कि कांग्रेस इस मौके का कितना सही इस्तेमाल कर पाती है.
BJP के लिए चुनौती या रणनीति?
नंदिता गरलोसा का पार्टी छोड़ना BJP के लिए एक चुनौती जरूर हो सकता है, लेकिन इसे पूरी तरह नुकसान कहना जल्दबाजी होगी. पार्टी नए चेहरों को मौका देना चाहती है, संगठन को मजबूत करने की रणनीति और नेतृत्व में बदलाव की संभावना. BJP पहले भी कई चुनावों में मजबूत संगठन के दम पर वापसी कर चुकी है, इसलिए इस बार भी मुकाबला कड़ा रहने की संभावना है.
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