PUSU Elections: पटना यूनिवर्सिटी छात्र संघ (PUSU) चुनाव 2026 ने इस बार कैंपस की राजनीति में बड़ा बदलाव कर दिया है. 42 साल बाद कांग्रेस की छात्र इकाई National Students’ Union of India (NSUI) ने दमदार वापसी करते हुए अध्यक्ष और महासचिव जैसे अहम पदों पर कब्जा जमा लिया है. नतीजों के ऐलान के साथ ही विश्वविद्यालय परिसर में जश्न का माहौल देखने को मिला.समर्थकों ने ढोल-नगाड़ों के साथ जीत का जश्न मनाया और नारेबाजी की.
अध्यक्ष पद पर शांतनु शेखर की बड़ी जीत
अध्यक्ष पद के लिए NSUI के प्रत्याशी शांतनु शेखर ने 2896 वोट हासिल कर शानदार जीत दर्ज की. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी छात्र जेडीयू के प्रिंस राज को बड़े अंतर से हराया. प्रिंस राज को 1400 वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे. इस जीत को NSUI के लिए ऐतिहासिक माना जा रहा है, क्योंकि चार दशक बाद यह पद उनके खाते में गया है.
जीत के बाद शांतनु शेखर ने कहा, “यह जीत सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि पूरे छात्र समुदाय की है.हम कैंपस में शिक्षा, पारदर्शिता और छात्र हितों के लिए काम करेंगे.”
उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय का कमाल
उपाध्यक्ष पद पर मुकाबला बेहद रोमांचक रहा. निर्दलीय उम्मीदवार उमड़ सिफत फैज ने 71 वोटों से जीत दर्ज की. सिफत फैज को 1568 वोट मिले, जबकि छात्र जेडीयू के आयुष हर्ष को 1497 वोट मिले.इस नतीजे ने यह साफ कर दिया कि छात्र इस बार पारंपरिक संगठनों से हटकर भी विकल्प तलाश रहे हैं.
महासचिव पद पर NSUI की खुशी
महासचिव पद के लिए NSUI और छात्र राजद के बीच कड़ी टक्कर रही.NSUI की उम्मीदवार खुशी ने 2164 वोट पाकर जीत दर्ज की.छात्र राजद के प्रत्युष राज को 1611 वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे. इस जीत के साथ NSUI ने केंद्रीय पैनल के दो प्रमुख पद अपने नाम कर लिए.
ABVP की मजबूत मौजूदगी
चुनाव में Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP) ने भी मजबूत प्रदर्शन किया.
संयुक्त सचिव पद पर अभिषेक शर्मा ने 2143 वोट पाकर जीत हासिल की. उन्होंने NSUI के मनौव्वर आजम को 392 वोटों से हराया. वहीं कोषाध्यक्ष पद पर ABVP के हर्षवर्धन ने बाजी मारी.इससे साफ है कि कैंपस की राजनीति में ABVP की पकड़ अब भी मजबूत बनी हुई है.
पांच केंद्रीय पदों का समीकरण
पटना यूनिवर्सिटी के सेंट्रल पैनल के पांच पदों में:
- अध्यक्ष – NSUI
- महासचिव – NSUI
- संयुक्त सचिव – ABVP
- कोषाध्यक्ष – ABVP
- उपाध्यक्ष – निर्दलीय
छात्र जेडीयू, छात्र राजद और वामपंथी संगठन आइसा को इस बार कोई केंद्रीय पद नहीं मिल सका.कुल मिलाकर छात्रों ने अलग-अलग संगठनों को मौका दिया, लेकिन सबसे बड़ा फायदा NSUI को हुआ.
रिकॉर्ड मतदान और युवाओं की भागीदारी
इस बार चुनाव में छात्रों की भागीदारी उल्लेखनीय रही. कई कॉलेजों में सुबह से ही मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें देखी गईं. चुनाव अधिकारियों के मुताबिक, मतदान प्रतिशत पिछले वर्षों की तुलना में अधिक रहा. इसे छात्र राजनीति के प्रति बढ़ती जागरूकता का संकेत माना जा रहा है.
42 साल बाद वापसी का क्या मतलब?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 42 साल बाद NSUI की वापसी बिहार की छात्र राजनीति में एक बड़ा संकेत है. यह परिणाम राज्य की व्यापक राजनीति पर भी असर डाल सकता है. पटना यूनिवर्सिटी लंबे समय से बिहार की राजनीति का केंद्र रही है. यहां के छात्र संघ चुनाव अक्सर राज्य की सियासी दिशा का संकेत देते हैं.
कैंपस में जश्न और उम्मीदें
नतीजों के बाद कैंपस में समर्थकों की भीड़ जुट गई. रंग-गुलाल उड़ाए गए और जीत का जश्न देर रात तक चलता रहा. छात्रों का कहना है कि वे अब छात्रसंघ से बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं, पारदर्शी प्रशासन और कैंपस में सुरक्षा की उम्मीद करते हैं.
मुद्दे क्या थे?
इस चुनाव में छात्रों के सामने कई अहम मुद्दे थे:
- हॉस्टल की समस्याएं
- फीस वृद्धि
- लाइब्रेरी और लैब सुविधाएं
- कैंपस सुरक्षा
- प्लेसमेंट और करियर मार्गदर्शन
NSUI ने अपने घोषणापत्र में छात्र कल्याण और पारदर्शिता पर जोर दिया था.
प्रशासन की भूमिका और सुरक्षा व्यवस्था
चुनाव प्रक्रिया के दौरान विश्वविद्यालय प्रशासन ने कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की थी. कैंपस में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई थी और मतदान केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी रखी गई. प्रशासन का कहना है कि पूरी प्रक्रिया शांतिपूर्ण और पारदर्शी तरीके से संपन्न हुई.
सोशल मीडिया पर छाया चुनाव
इस बार छात्रसंघ चुनाव केवल कैंपस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सोशल मीडिया पर भी काफी चर्चा में रहा. उम्मीदवारों ने इंस्टाग्राम, फेसबुक और व्हाट्सऐप ग्रुप्स के जरिए प्रचार किया. युवाओं के बीच डिजिटल कैंपेनिंग का असर साफ तौर पर देखने को मिला.
आगे की चुनौतियां
नई छात्रसंघ टीम के सामने अब कई चुनौतियां होंगी. चुनावी वादों को जमीन पर उतारना, प्रशासन के साथ समन्वय बनाए रखना और विभिन्न छात्र संगठनों के बीच संतुलन कायम करना आसान नहीं होगा. इसके अलावा, शैक्षणिक सुधार, डिजिटल सुविधाओं का विस्तार और कैंपस में बेहतर बुनियादी ढांचे की मांग भी प्राथमिकता में रहेगी.
भविष्य की दिशा
छात्रों का मानना है कि यह परिणाम बदलाव की शुरुआत हो सकता है.अगर नई टीम अपने वादों पर खरी उतरती है, तो आने वाले वर्षों में कैंपस की राजनीति और अधिक मुद्दा-आधारित और रचनात्मक हो सकती है. फिलहाल, पटना यूनिवर्सिटी में जश्न का माहौल है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी, जब जीत को जिम्मेदारी में बदलना होगा.
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