Sabang Port Development: हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत अपनी समुद्री रणनीति को लगातार मजबूत कर रहा है। बता दें की इसी दिशा में भारत और इंडोनेशिया ने सबांग पोर्ट के विकास को लेकर बड़ा कदम उठाया है। जिससे यह बंदरगाह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के पश्चिमी प्रवेश द्वार पर स्थित है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई। जिसमें एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ बंदरगाह विकास परियोजना नहीं है, बल्कि हिंद महासागर में भारत की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी का संकेत भी है।
आखिर क्यों खास है सबांग पोर्ट?
सबांग पोर्ट इंडोनेशिया के आचेह प्रांत में स्थित है। ऐसे में इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश बिंदु के बेहद करीब है। इसी रास्ते से दुनिया का बड़ा समुद्री व्यापार गुजरता है।
जानकारी के अनुसार भारत इस बंदरगाह के आधुनिकीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास में सहयोग करेगा। इससे भारत को हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री गतिविधियों में अपनी भूमिका मजबूत करने का अवसर मिलेगा।
जानें क्या है मलक्का जलडमरूमध्य?
मलक्का जलडमरूमध्य हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ने वाला संकरा समुद्री मार्ग है। यह इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित है।
यह दुनिया के सबसे व्यस्त व्यापारिक मार्गों में गिना जाता है। अनुमान है कि वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हर साल करीब 2.8 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का सामान इस मार्ग से परिवहन किया जाता है।इसी रास्ते से कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला, कंटेनर, मशीनरी और अन्य जरूरी सामान एशियाई देशों तक पहुंचता है।
भारत के लिए क्यों जरुरी है समुद्री मार्ग?
दरअसल भारत का पूर्वी एशिया के देशों जैसे जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और आसियान देशों के साथ होने वाला बड़ा व्यापार इसी मार्ग से होता है।
इसके अलावा भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को मजबूत करने में भी मलक्का जलडमरूमध्य की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि इस क्षेत्र में भारत की रणनीतिक उपस्थिति बढ़ती है तो समुद्री सुरक्षा, व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से देश को बड़ा फायदा मिल सकता है।

चीन के लिए भी जीवनरेखा है मलक्का
मलक्का जलडमरूमध्य चीन की अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। चीन के आयातित तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
पूर्व चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने वर्ष 2003 में “मलक्का दुविधा” (Malacca Dilemma) का जिक्र करते हुए कहा था कि यदि किसी संकट के समय यह समुद्री मार्ग बाधित हो जाए तो चीन की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसी वजह से चीन लंबे समय से हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
ग्रेट निकोबार परियोजना से मिलेगा बड़ा फायदा
भारत पहले से ही अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट परियोजना पर काम कर रहा है।इस परियोजना में आधुनिक ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट, ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, बिजली संयंत्र और नई टाउनशिप का निर्माण शामिल है। इसका उद्देश्य भारत को हिंद महासागर का प्रमुख लॉजिस्टिक्स और समुद्री व्यापार केंद्र बनाना है।
सबांग पोर्ट और ग्रेट निकोबार परियोजना एक-दूसरे के पूरक माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों परियोजनाओं के पूरा होने के बाद भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के दोनों ओर रणनीतिक पहुंच मिल सकती है।
चीन की ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति का जवाब
बता दें की पिछले कुछ सालों में चीन ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स रणनीति के तहत हिंद महासागर क्षेत्र के कई बंदरगाहों में निवेश किया है।
पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट, श्रीलंका का हम्बनटोटा बंदरगाह और म्यांमार का क्याउकफ्यू पोर्ट अक्सर इसी रणनीति का हिस्सा माने जाते हैं। ऐसे में भारत और इंडोनेशिया का सबांग पोर्ट सहयोग क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भारत अपने समुद्री हितों की बेहतर सुरक्षा कर सकेगा।
इंडो-पैसिफिक में मजबूत होगी साझेदारी
भारत और इंडोनेशिया दोनों ही मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के समर्थक हैं। जिसमें दोनों देशों के बीच समुद्री सुरक्षा, नौवहन की स्वतंत्रता, आपूर्ति श्रृंखला और व्यापारिक सहयोग को लेकर पहले भी कई समझौते हो चुके हैं। अब सबांग पोर्ट परियोजना इन संबंधों को नई मजबूती दे सकती है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि भविष्य में यह परियोजना हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सामरिक स्थिति को और मजबूत बनाएगी।
भारत को क्या होंगे फायदे?
सबांग पोर्ट परियोजना से भारत को कई रणनीतिक और आर्थिक लाभ मिल सकते हैं।
- हिंद महासागर में समुद्री उपस्थिति मजबूत होगी।
- मलक्का जलडमरूमध्य के प्रवेश क्षेत्र तक रणनीतिक पहुंच बढ़ेगी।
- भारत-इंडोनेशिया रक्षा और समुद्री सहयोग मजबूत होगा।
- पूर्वी एशिया के साथ व्यापार को नई गति मिलेगी।
- इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ेगा।
- समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती मिलेगी।
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