संदीप पाठक: पंजाब की राजनीति में एक बार फिर से हलचल तेज हो गई है। राज्यसभा सांसद Sandeep Pathak पर दर्ज दो FIR ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। आम आदमी पार्टी (AAP) छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के कुछ ही दिनों बाद उनके खिलाफ कार्रवाई होने पर विपक्ष ने सवाल उठाए हैं। इस पूरे मामले को लेकर भाजपा, अकाली दल और कांग्रेस ने पंजाब सरकार पर निशाना साधा है।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के लिए बता दें कि हाल ही में आम आदमी पार्टी से अलग होकर भाजपा में शामिल हुए संदीप पाठक के खिलाफ पंजाब में दो केस दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में गैर-जमानती धाराएं लगाई गई हैं, जिससे उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जिससे राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा FIR की टाइमिंग को लेकर हो रही है। विपक्ष का आरोप है कि जैसे ही पाठक ने पार्टी बदली, उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू हो गई। इस पर सवाल उठ रहा है कि क्या यह कानून का मामला है या राजनीतिक बदले की कार्रवाई।
अकाली दल का हमला
शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने इस मुद्दे पर तीखा हमला बोला है। जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह “हीरो से जीरो” बनने की कहानी है।
मजीठिया ने कहा कि जो नेता कभी आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीबी थे, आज वही निशाने पर हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पाठक पहले गलत थे, तो उस समय उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। जिसमें उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी बदलते ही गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज होना साफ तौर पर बदले की राजनीति की ओर इशारा करता है। उनके मुताबिक, यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
भाजपा का आरोप
पंजाब भाजपा अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने भी मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि जो नेता कुछ समय पहले तक पार्टी के “आंखों के तारे” थे, अचानक उनमें कमियां कैसे दिखने लगीं। जाखड़ ने इसे “दोहरे चरित्र” का उदाहरण बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा में शामिल होने वाले नेताओं को टारगेट किया जा रहा है, जबकि अपनी पार्टी के नेताओं को संरक्षण दिया जा रहा है। जिसमें उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार अपने ही विवादित विधायकों को बचाने में लगी है और राजनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप बाजवा ने भी इस मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यह मामला न्याय से ज्यादा राजनीतिक संघर्ष का प्रतीक लगता है। बाजवा का कहना है कि अगर पाठक पर लगे आरोप सही हैं, तो यह सवाल उठता है कि जब वे पार्टी के अंदर थे, तब उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। उन्होंने कहा कि यह मामला आम आदमी पार्टी के अंदरूनी सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करता है। साथ ही, यह भी आरोप लगाया कि पार्टी अपने हिसाब से नैतिकता तय करती है और जरूरत के अनुसार फैसले बदलती है।
AAP की स्थिति पर सवाल
इस पूरे विवाद के केंद्र में आम आदमी पार्टी की भूमिका भी है। अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान जैसे नेताओं ने पहले संदीप पाठक को पार्टी का अहम चेहरा बताया था। अब जब वही नेता विपक्ष में चले गए हैं, तो उन पर आरोप लगना कई सवाल खड़े करता है। विपक्ष का कहना है कि अगर कोई गलत काम हुआ है, तो उसकी जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं हो सकती। यह भी पूछा जा रहा है कि क्या पार्टी नेतृत्व को पहले से इन मामलों की जानकारी थी? अगर थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं की गई और अगर नहीं थी, तो क्या यह नेतृत्व की विफलता है?
राजनीतिक बदले की बहस
इस पूरे मामले ने “राजनीतिक बदले” की बहस को फिर से हवा दे दी है। भारत की राजनीति में अक्सर देखा गया है कि पार्टी बदलने के बाद नेताओं के खिलाफ जांच या केस शुरू हो जाते हैं। जिसमें विपक्ष का कहना है कि यह मामला भी उसी पैटर्न का हिस्सा है। वहीं, सरकार की ओर से अभी तक इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं आई है।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसे मामलों से लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं। अगर कार्रवाई सही है, तो उसे पारदर्शी तरीके से सामने लाना जरूरी है, ताकि जनता का भरोसा बना रहे।
जनता की नजर 2027 पर
इस पूरे विवाद के बीच विपक्ष ने 2027 के विधानसभा चुनावों का भी जिक्र करना शुरू कर दिया है। भाजपा और अन्य दलों का कहना है कि जनता सब देख रही है और समय आने पर जवाब देगी।राजनीतिक माहौल को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले समय में यह मुद्दा और ज्यादा तूल पकड़ सकता है। खासकर तब, जब चुनावी माहौल करीब आएगा।
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