UGC New Regulations: देशभर में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) को लेकर हाल ही में जारी किए गए नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज में नाराजगी की स्थिति पैदा हो गई थी। वहीं, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आज 29 जनवरी को सुनवाई करते हुए UGC के नए रेगुलेशन पर रोक लगा दी और सरकार को आदेश दिए हैं कि इस मसले पर एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाई जाए।
जानकारी के लिए बता दें कि, UGC ने 13 जनवरी 2026 को नए नियम जारी किए थे। जिसमें इन नियमों के अनुसार देशभर के सभी कॉलेज और विश्वविद्यालय Equity Center, Equity Squad और Equity Committee बनाना अनिवार्य करेंगे। इन समितियों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी छात्र या कर्मचारी के साथ जाति, धर्म, लिंग या अन्य आधार पर भेदभाव न हो। कमेटी में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधि होना अनिवार्य है। जिसमें UGC का कहना है कि, 2020 से 2025 के बीच पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ भेदभाव और शिकायतों में 100% से अधिक वृद्धि हुई है। इसी को देखते हुए नए नियम बनाए गए हैं। वहीं, नियमों में यह भी कहा गया कि संस्थानों में 24×7 हेल्पलाइन उपलब्ध रहेगी। अगर कोई संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करता है, तो UGC उनके फंड रोक सकता है या मान्यता रद्द कर सकता है।
हालांकि, नए नियमों को लेकर सवर्ण समाज में विरोध देखने को मिला। जिसमें लोगों का मानना है कि इन नियमों का दुरुपयोग किया जा सकता है और समाज में और अधिक भेदभाव पैदा हो सकता है। कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश और दिल्ली में प्रदर्शन भी हुए। विरोधियों का कहना है कि नियम समाज में खाई बढ़ा सकते हैं और केवल कुछ वर्ग को लाभ पहुंचा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
बता दें कि, इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया गया। आज 29 जनवरी को सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) का कहना है कि, नए नियमों में प्रयुक्त शब्दों से यह संकेत मिलता है कि रेगुलेशन का दुरुपयोग संभव है। CJI ने यह भी सवाल उठाया कि देश 75 साल के बाद जातिहीन समाज बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, क्या हम फिर पीछे लौट रहे हैं? क्या हम एक प्रतिगामी समाज की ओर बढ़ रहे हैं। जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को आदेश दिया कि वह एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाए, जो इस बात पर विचार करे कि कैसे सभी वर्गों के लिए समान अवसर और न्याय सुनिश्चित किया जा सके। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी नियम का पालन ऐसा होना चाहिए जिससे समाज में और अधिक भेदभाव न पैदा हो।

समाज में बढ़ विभाजन सकता है
दरअसल, इस मामले में एडवोकेट विष्णु शंकर जैन ने सेक्शन 3(c) को चुनौती दी। उनका कहना है कि इस नियम के तहत जाति आधारित भेदभाव की परीक्षा असंवैधानिक है और इससे समाज में विभाजन और बढ़ सकता है। जिसमें एक्सपर्ट्स का कहना है, कि UGC का मकसद सही है, लेकिन नियमों को लागू करने का तरीका संतुलित होना चाहिए। अगर नियम केवल कुछ वर्गों को लक्षित करेंगे, तो समाज में नाराजगी और विरोध बढ़ सकता है। ऐसे में अदालत की रोक और उच्च स्तरीय कमेटी बनाना आवश्यक कदम माना जा रहा है। जिसमें शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि Equity Committee और Helpline जैसी व्यवस्था सकारात्मक पहल है। यह सुनिश्चित करती है कि शिक्षा संस्थानों में कोई भी छात्र या कर्मचारी अपने अधिकारों से वंचित न हो। लेकिन, साथ ही यह भी जरूरी है कि नियमों का दुरुपयोग न हो।
UGC के नए नियमों पर रोक
UGC के नए नियमों पर रोक लगने के बाद अब यह देखना होगा कि सरकार और उच्च स्तरीय कमेटी किस तरह सभी वर्गों के लिए न्यायपूर्ण समाधान निकालती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सभी वर्गों की सुनवाई और सहयोग से निर्णय लिया गया, तो यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार और समाज में समानता की दिशा में सकारात्मक कदम हो सकता है। वहीं, इस मामले से साफ है कि भारत में जाति आधारित भेदभाव को रोकना और सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना अभी भी एक संवेदनशील मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट की रोक और कमेटी के गठन से यह संदेश जाता है कि कानून लागू करते समय संतुलन और न्याय दोनों जरूरी हैं।
इस मामले में आगे की सुनवाई और सरकार की कमेटी की सिफारिशें आने वाले दिनों में शिक्षा संस्थानों और समाज में बड़ा असर डाल सकती हैं। इसे एक ऐसा मौका माना जा रहा है जब देश जाति भेदभाव कम करने और सभी वर्गों को समान अवसर देने की दिशा में ठोस कदम उठा सकता है।
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