राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत एक बार फिर से खबरों की सुर्खियों का हिस्सा बने हुए है। दरअसल, भागवत ने कोलकाता में आयोजित व्याख्यानमाला कार्यक्रम में जनसंख्या, परिवार व्यवस्था और राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान एक विवादित बयान दिया, जिससे एक नई बहस छिड़ गई है। उन्होंने कहा कि भारत के नागरिको को भावनाओं में नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और दूरदर्शी सोच के साथ जनसंख्या नीति तय करनी चाहिए।
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परिवार और विवाह समाज की मजबूत रीढ़
भागवत ने लिव-इन रिलेशनशिप को जिम्मेदारी से पलायन बताते हुए कहा कि परिवार और विवाह समाज की मजबूत रीढ़ है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा की यह केवल व्यक्तिगत सुख का विषय नहीं है, बल्कि समाज को स्थिर और संस्कारवान बनाने की प्रक्रिया भी है। उनके अनुसार, परिवार वह पहली पाठशाला है, जहां व्यक्ति समाज में रहना सीखता है।
3 बच्चों की जरूरत को समझाया
मोहन भागवत ने तीन बच्चों की जरूरत को समझाते हुए उन्होंने डॉक्टरों, मनोवैज्ञानिकों और जनसंख्या विशेषज्ञों को अपने विचारों को साझा किया। उन्होंने कहा कि यदि विवाह कम उम्र में हो और परिवार में तीन बच्चे हों, तो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, बल्कि सामाजिक संतुलन भी बना रहता है। तीन बच्चे होने से व्यक्ति में त्याग, समन्वय और अहंकार नियंत्रण की भावना विकसित होती है।

भारत की प्रजनन दर 1.9 तक गिर चुकी
भागवत ने जनसांख्यिकी विशेषज्ञों का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि यदि जन्म दर 2.1 से नीचे जाती है जिसके समाज जल्दी वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगता है, जिसके करण आर्थिक और सामाजिक संकट पैदा होने लगते हैं। उन्होंने कहा कि आज भारत की कुल प्रजनन दर कई राज्यों में 1.9 तक गिर चुकी है और बिहार जैसे राज्यों के कारण ही राष्ट्रीय औसत संतुलित है।
उन्होंने अपने विचारों में स्पष्ट किया कि जनसंख्या न तो पूरी तरह बोझ है और न ही केवल वरदान, बल्कि सही नीति और प्रबंधन से यह देश की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। इसके लिए पर्यावरण, संसाधन, महिलाओं के स्वास्थ्य और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर कम से कम 50 साल की नीति बननी चाहिए।
भारत को हिंदू राष्ट्र बताने पर भागवत ने कहा कि यह किसी कानून या संशोधन पर निर्भर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सत्य है। उन्होंने कहा कि जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है,और भारतीय संस्कृति का सम्मान करता है, वही इस राष्ट्र की आत्मा है।
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