Fuel Price Hike: देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल ही में हुई करीब 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी का असर अब आम लोगों की जेब पर दिखाई देने लगा है। जिसमें ईंधन महंगा होने से ट्रांसपोर्ट, डिलीवरी और उत्पादन लागत तेजी से बढ़ रही है। इसका सीधा असर खाने-पीने की चीजों, किराना सामान, ऑनलाइन डिलीवरी और रोजमर्रा के उपयोग वाले उत्पादों की कीमतों पर पड़ सकता है। जिसमें कई कंपनियों ने संकेत दिए हैं कि यदि ईंधन की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो उन्हें अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर बढ़ा दबाव
पेट्रोल और डीजल की कीमत बढ़ने का सबसे पहला असर लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर पड़ता है। देश में माल ढुलाई का बड़ा हिस्सा ट्रकों और डीजल वाहनों के जरिए होता है। ऐसे में डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट कंपनियों की लागत बढ़ गई है।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, किसी भी लॉजिस्टिक्स कंपनी की कुल लागत में ईंधन का हिस्सा करीब 20 से 30 % तक होता है। अब डीजल की कीमत बढ़ने से लंबी दूरी की डिलीवरी और अंतिम डिलीवरी यानी लास्ट माइल डिलीवरी दोनों महंगी हो रही हैं। ऐसे में कंपनियों का कहना है कि डिलीवरी खर्च में 2 से 5 % तक बढ़ोतरी हो सकती है। फिलहाल कई कंपनियां अतिरिक्त लागत खुद वहन कर रही हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना उनके लिए आसान नहीं होगा। आने वाले समय में यह बोझ ग्राहकों पर डाला जा सकता है।
क्विक कॉमर्स कंपनियों की बढ़ी चिंता
जानकारी के लिए बता दें की पिछले कुछ सालों से देश में क्विक कॉमर्स यानी 10 से 15 मिनट में सामान पहुंचाने वाली सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। जिसमें ग्रॉसरी, फूड और ई-कॉमर्स कंपनियां बेहद कम मार्जिन पर काम करती हैं। ऐसे में ईंधन की कीमत बढ़ना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है। जिनमें कई कंपनियां अब अपनी डिलीवरी रणनीति में बदलाव करने पर विचार कर रही हैं। कुछ प्लेटफॉर्म फ्री डिलीवरी की न्यूनतम सीमा बढ़ा सकते हैं। वहीं कई कंपनियां भारी डिस्काउंट और ऑफर कम करने की तैयारी में हैं।
अब ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि छोटे शहरों और कम आबादी वाले इलाकों में तेज डिलीवरी सेवाओं को सीमित किया जा सकता है, क्योंकि वहां डिलीवरी लागत ज्यादा आती है। इससे ग्राहकों को पहले जैसी सस्ती और तेज सेवाएं मिलना मुश्किल हो सकता है।
ऑनलाइन ऑर्डर करना हो सकता है महंगा
अब अगर ईंधन की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो ऑनलाइन फूड ऑर्डर, ग्रॉसरी डिलीवरी और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर अतिरिक्त चार्ज बढ़ सकते हैं। जिसमें कई कंपनियां पहले से ही “डिलीवरी फीस” और “सर्ज चार्ज” जैसे शुल्क बढ़ाने लगी हैं। इसका असर सीधे आम ग्राहकों पर पड़ेगा, जो लोग रोजाना ऑनलाइन खाना या किराना ऑर्डर करते हैं, उन्हें हर ऑर्डर पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। छोटे ऑर्डर पर फ्री डिलीवरी खत्म होने की संभावना भी बढ़ गई है।
इलेक्ट्रिक वाहनों से मिल रही थोड़ी राहत
बता दें की बढ़ती ईंधन कीमतों के बीच इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल कंपनियों के लिए राहत का आप्शन बन रहा है। कई बड़ी डिलीवरी कंपनियां अब अपने बेड़े में इलेक्ट्रिक स्कूटर और ईवी शामिल कर रही हैं। कुछ ग्रॉसरी और फूड डिलीवरी कंपनियों का दावा है कि उनकी 40 प्रतिशत से ज्यादा डिलीवरी अब इलेक्ट्रिक वाहनों के जरिए हो रही है। इससे ईंधन पर होने वाला खर्च कम करने में मदद मिल रही है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पेट्रोल और डीजल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो कंपनियां और तेजी से ईवी की ओर शिफ्ट कर सकती हैं। इससे भविष्य में डिलीवरी मॉडल में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
FMCG और खाद्य कंपनियों पर भी असर
ऐसे में ईंधन महंगा होने से सिर्फ ट्रांसपोर्ट सेक्टर ही नहीं बल्कि खाद्य और एफएमसीजी कंपनियों पर भी दबाव बढ़ गया है। जिसमें पैकेज्ड फूड, डेयरी, रेडी-टू-कुक और रोजमर्रा के उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की लागत लगातार बढ़ रही है। इन कंपनियों का कहना है कि पहले से ही कच्चे माल, पैकेजिंग और सप्लाई चेन की लागत बढ़ी हुई थी। अब ईंधन महंगा होने से कुल लागत में और बढ़ोतरी हो रही है। कुछ कंपनियों के इनपुट कॉस्ट में 17 से 25 प्रतिशत तक का इजाफा देखा गया है। अगर स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो कंपनियां अपने उत्पादों के दाम बढ़ा सकती हैं। इसका असर सीधे रसोई के बजट पर पड़ेगा। दूध, ब्रेड, स्नैक्स, तेल, पैकेज्ड फूड और अन्य जरूरी सामान महंगे हो सकते हैं।

आम लोगों की जेब पर बढ़ेगा बोझ
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का असर अंततः हर उपभोक्ता तक पहुंचता है। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से हर वस्तु की कीमत प्रभावित होती है। चाहे सब्जियां हों, किराना सामान हो या ऑनलाइन सेवाएं, हर जगह खर्च बढ़ सकता है। मध्यम वर्ग और कम आय वाले परिवारों पर इसका ज्यादा असर देखने को मिल सकता है। लोग अब सस्ते और वैल्यू-फॉर-मनी उत्पादों की तरफ रुख कर सकते हैं। वहीं गैर-जरूरी खर्चों में कटौती भी बढ़ सकती है।
छोटी कंपनियों के लिए बढ़ी चुनौती
ईंधन महंगा होने का सबसे ज्यादा असर छोटी और नई कंपनियों पर पड़ सकता है। बड़ी कंपनियों के पास लागत संभालने की क्षमता और मजबूत सप्लाई नेटवर्क होता है, लेकिन छोटे ब्रांड और D2C कंपनियों के लिए यह स्थिति मुश्किल बन सकती है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि कई छोटी कंपनियां अपने मार्जिन कम करके काम कर रही हैं। यदि लागत लगातार बढ़ती रही, तो उन्हें कीमतें बढ़ाने या कारोबार सीमित करने का फैसला लेना पड़ सकता है।
आने वाले महीनों में बदल सकती है रणनीति
बाजार एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि ईंधन की कीमतें जल्द कम नहीं हुईं, तो कंपनियां अपनी प्राइसिंग और डिलीवरी रणनीति में बड़े बदलाव कर सकती हैं। कंपनियां ईवी अपनाने, डिलीवरी स्लॉट कम करने, डिस्काउंट घटाने और न्यूनतम ऑर्डर सीमा बढ़ाने जैसे कदम उठा सकती हैं। इसके अलावा सप्लाई चेन को अधिक प्रभावी बनाने और लागत कम करने के लिए नई तकनीकों पर भी जोर बढ़ सकता है।
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