Bakrid 2026: भारत में इस साल बकरीद यानी ईद-उल-अजहा 28 मई 2026 को मनाई जाएगी। ऐसे में इस्लाम धर्म के सबसे अहम त्योहारों में शामिल बकरीद को लेकर देशभर में तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इस मौके पर मुस्लिम समुदाय के लोग नमाज अदा करते हैं और जानवरों की कुर्बानी देते हैं। हालांकि, हर साल की तरह इस बार भी कुर्बानी को लेकर राजनीति तेज हो गई है। जिसमें पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत कई राज्यों में सरकारों ने गाइडलाइन जारी की है कि किन जानवरों की कुर्बानी की जा सकती है और किनकी नहीं।
अब ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इस्लाम में कुर्बानी का असली मतलब क्या है। क्या सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना ही इसका उद्देश्य है या इसके पीछे कोई बड़ा संदेश छिपा है। आइए जानते हैं यहां पूरी जानकारी
क्या है बकरीद या ईद-उल-अजहा?
आपकी जानकारी के लिए बता दें की इस्लाम में दो बड़े त्योहार मनाए जाते हैं। पहला ईद-उल-फित्र, जिसे मीठी ईद कहा जाता है और दूसरा ईद-उल-अजहा, जिसे आम बोलचाल में बकरीद कहा जाता है। इस्लामिक कैलेंडर के आखिरी महीने जिलहिज्जा की 10वीं तारीख को ईद-उल-अजहा मनाई जाती है।
जिसमें यह त्योहार हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी और अल्लाह के प्रति उनकी वफादारी की याद में मनाया जाता है। इस्लामी मान्यता के अनुसार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम का इम्तिहान लेने के लिए उनसे उनकी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने को कहा था।
कैसे शुरू हुई कुर्बानी की परंपरा?
इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक, हजरत इब्राहिम को 80 साल की उम्र में बेटा हजरत इस्माइल मिला था। वह उनके लिए सबसे ज्यादा प्रिय थे। जब अल्लाह ने उनसे कुर्बानी देने को कहा तो उन्होंने अपने बेटे को अल्लाह की राह में कुर्बान करने का फैसला किया। जिसमें कहा जाता है कि जैसे ही हजरत इब्राहिम ने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, अल्लाह ने उनकी नीयत और वफादारी को कबूल कर लिया और हजरत इस्माइल की जगह एक दुंबा भेज दिया। तभी से जानवरों की कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई। जिससे दुनियाभर के मुसलमान इसी घटना की याद में ईद-उल-अजहा मनाते हैं और कुर्बानी करते हैं।
इस्लाम में कुर्बानी का असली मतलब क्या है?
इस्लामी विद्वानों के अनुसार, कुर्बानी का मतलब केवल किसी जानवर की जान लेना नहीं है। इसका असली मकसद इंसान के अंदर त्याग, वफादारी और अल्लाह के प्रति समर्पण की भावना पैदा करना है। ऐसे में कुर्बानी यह संदेश देती है कि इंसान अपने लालच, अहंकार और स्वार्थ को छोड़कर जरूरतमंदों की मदद करे। यही वजह है कि कुर्बानी के गोश्त को गरीबों और जरूरतमंदों में बांटने की भी परंपरा है।
किन लोगों पर कुर्बानी जरूरी है?
दरअसल इस्लाम में हर मुसलमान पर कुर्बानी अनिवार्य नहीं है। जिसमें कुर्बानी सिर्फ उसी व्यक्ति पर जरूरी मानी जाती है जो आर्थिक रूप से सक्षम हो। इसे इस्लाम में “साहिब-ए-निसाब” कहा जाता है। अब अगर किसी व्यक्ति के पास साढ़े सात तोला सोना, साढ़े 52 तोला चांदी या उसके बराबर धन-दौलत है तो उस पर कुर्बानी वाजिब मानी जाती है। इस्लाम में कर्ज लेकर या किसी पर बोझ बनकर कुर्बानी करने की इजाजत नहीं दी गई है।

कुर्बानी के लिए जानवर कैसा होना चाहिए?
इस्लाम में कुर्बानी के लिए जानवर को लेकर भी कई नियम बताए गए हैं। जिसमें जानवर पूरी तरह स्वस्थ होना चाहिए। वह अंधा, लंगड़ा, बहुत कमजोर या गंभीर बीमारी से पीड़ित नहीं होना चाहिए। इसके अलावा जानवर को किसी तरह का दर्द या तकलीफ देना भी गलत माना गया है। इस्लाम में एक जानवर के सामने दूसरे जानवर को काटना या उसके सामने छुरी तेज करना भी मना है। इस्लामी शिक्षाओं में जानवरों के साथ रहम और इंसानियत पर जोर दिया गया है।
किन जानवरों की कुर्बानी की इजाजत
इस्लाम में बकरा, भेड़, दुंबा, भैंस, बैल, गाय और ऊंट की कुर्बानी की इजाजत दी गई है। हालांकि, इसके साथ एक अहम शर्त भी जुड़ी हुई है कि जिस देश में जिस जानवर की कुर्बानी पर कानूनी रोक हो, वहां उसकी कुर्बानी नहीं करनी चाहिए।
बता दें की भारत में कई राज्यों में गाय की कुर्बानी पर प्रतिबंध है। ऐसे में इस्लामी विद्वानों का कहना है कि कानून का पालन करना जरूरी है और प्रतिबंधित जानवरों की कुर्बानी नहीं करनी चाहिए।
जानवर की उम्र को लेकर क्या नियम हैं?
इस्लाम में कुर्बानी के लिए जानवर की उम्र तय की गई है। बकरा, भेड़ और दुंबा कम से कम एक साल का होना चाहिए। भैंस की उम्र दो साल और ऊंट की उम्र कम से कम पांच साल जरूरी मानी गई है। इसके साथ जानवर का स्वस्थ, मजबूत और किसी बीमारी से मुक्त होना भी जरूरी बताया गया है, तभी कुर्बानी सही मानी जाती है।
बड़े और छोटे जानवर की कुर्बानी में क्या फर्क है?
इस्लाम में छोटे जानवर जैसे बकरा या भेड़ की कुर्बानी सिर्फ एक व्यक्ति की तरफ से की जाती है। वहीं बड़े जानवर जैसे भैंस या ऊंट में सात लोग शामिल हो सकते हैं। इसलिए कई लोग मिलकर बड़े जानवर की कुर्बानी करते हैं।
कुर्बानी के गोश्त का क्या किया जाता है?
इस्लाम में कुर्बानी के बाद गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने की सलाह दी गई है। पहला हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों को दिया जाता है, ताकि हर जरूरतमंद तक खाना पहुंच सके। दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए रखा जाता है। वहीं तीसरा हिस्सा अपने घर के इस्तेमाल में लाया जाता है। इसका मकसद समाज में भाईचारा और मदद की भावना बढ़ाना है।
कुर्बानी को लेकर क्यों हो रही राजनीति?
बता दें की हर साल बकरीद के दौरान कुर्बानी को लेकर विवाद देखने को मिलता है। ऐसे में इस बार भी कई राज्यों ने गाइडलाइन जारी की है। जिसमें प्रशासन की तरफ से साफ कहा गया है कि खुले में कुर्बानी नहीं की जाए और कानून का पूरी तरह पालन किया जाए।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की सरकार बनने के बाद नियमों को और सख्त किया गया है। वहीं यूपी और दिल्ली में भी प्रशासन अलर्ट मोड पर है। हालांकि मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरुओं का कहना है कि इस्लाम हमेशा कानून का सम्मान करने की बात करता है और कुर्बानी भी कानूनी दायरे में रहकर ही की जानी चाहिए।
बकरीद का सामाजिक संदेश
ईद-उल-अजहा सिर्फ धार्मिक त्योहार नहीं बल्कि त्याग, इंसानियत और मदद का संदेश देने वाला पर्व है। इस दिन लोग जरूरतमंदों की मदद करते हैं और समाज में भाईचारे का संदेश देते हैं। इस्लाम में कुर्बानी का असली उद्देश्य इंसान के अंदर इंसानियत और त्याग की भावना पैदा करना है, न कि दिखावा करना।



