Iran US Peace Deal: मध्य पूर्व में कई महीनों से जारी तनाव और संघर्ष के बीच अब शांति की उम्मीदें मजबूत होती दिखाई दे रही हैं। बताया जा रहा है अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित शांति समझौते ने दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ऐसे में यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू हो जाता है तो इसका सबसे बड़ा लाभ उन देशों को मिलेगा जो तेल और गैस के आयात पर निर्भर हैं। भारत भी उनमें प्रमुख है।
आपकी जानकारी के लिए बता दें की भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 से 90 % कच्चा तेल और बड़ी मात्रा में गैस विदेशों से आयात करता है। ऐसे में मध्य पूर्व में शांति स्थापित होना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है।
तेल और गैस की कीमतों में मिल सकती है राहत
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखी गई थी। इससे भारत का आयात बिल बढ़ा और महंगाई पर दबाव बना। अब अगर अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता लागू होता है तो तेल की आपूर्ति सामान्य हो सकती है और कीमतों में गिरावट आने की संभावना बढ़ जाएगी।
तेल सस्ता होने से पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव कम होगा। इसके अलावा परिवहन लागत घटेगी, जिससे आम उपभोक्ताओं को भी राहत मिल सकती है।
होर्मुज़ स्ट्रेट खुलने से आसान होगा व्यापार
दुनिया के लगभग 20 % तेल का परिवहन होर्मुज़ स्ट्रेट के जरिए होता है। जिससे भारत के लिए भी यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि खाड़ी देशों से आने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से भारत पहुंचता है।
संघर्ष के दौरान यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी, जिससे सप्लाई चेन पर असर पड़ा। यदि समझौते के तहत होर्मुज़ स्ट्रेट फिर से पूरी तरह खुल जाता है तो भारत को तेल और गैस की आपूर्ति पहले की तरह सुचारु रूप से मिलने लगेगी। इससे शिपिंग लागत और बीमा खर्च भी कम होगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा सीधा फायदा
तेल की कीमतों में कमी का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। जिससे भारत का आयात बिल घटेगा और विदेशी मुद्रा की बचत होगी। इससे सरकार को विकास परियोजनाओं पर अधिक खर्च करने का अवसर मिल सकता है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि सस्ता तेल मिलने से महंगाई नियंत्रित रहेगी और आर्थिक विकास दर को भी मजबूती मिलेगी। उद्योगों की उत्पादन लागत घटेगी, जिससे विनिर्माण क्षेत्र को भी फायदा होगा।
खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों को मिलेगी सुरक्षा
मध्य पूर्व के देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। अनुमान के मुताबिक करीब एक करोड़ भारतीय विभिन्न खाड़ी देशों में रोजगार कर रहे हैं। इनमें इंजीनियर, डॉक्टर, तकनीकी विशेषज्ञों से लेकर श्रमिक वर्ग तक शामिल हैं।
युद्ध और तनाव के माहौल में इन भारतीयों की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंता बनी हुई थी। शांति समझौता लागू होने के बाद वहां स्थिरता बढ़ेगी और भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वातावरण मिल सकेगा। इसके साथ ही भारत आने वाला रेमिटेंस भी स्थिर बना रहेगा।
ईरानी तेल की वापसी से बढ़ेंगे विकल्प
दरअसल भारत पहले ईरान से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता था। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह व्यापार लगभग बंद हो गया था। अगर नए समझौते के तहत प्रतिबंधों में राहत मिलती है तो भारत फिर से ईरान से तेल आयात शुरू कर सकता है।
ऊर्जा एक्सपर्ट्स के अनुसार ईरानी कच्चा तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए काफी उपयुक्त माना जाता है। इससे भारत के पास तेल आयात के अधिक विकल्प होंगे और किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी।

उर्वरक और गैस क्षेत्र को भी होगा लाभ
भारत बड़ी मात्रा में उर्वरक और प्राकृतिक गैस का आयात करता है। मध्य पूर्व में स्थिरता आने से इन उत्पादों की आपूर्ति बेहतर हो सकती है। इससे कृषि क्षेत्र को राहत मिलेगी और उर्वरकों की कीमतों पर नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है।गैस की कीमतों में कमी आने से बिजली उत्पादन और उद्योगों की लागत भी कम हो सकती है।
चाबहार पोर्ट परियोजना को मिल सकती है नई रफ्तार
भारत ने ईरान के चाबहार बंदरगाह में लंबे समय के लिए निवेश किया है। यह परियोजना भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके जरिए भारत मध्य एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंच बना सकता है।
युद्ध और अस्थिरता के कारण इस परियोजना की गति प्रभावित हुई थी। यदि क्षेत्र में शांति स्थापित होती है तो चाबहार पोर्ट और इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) जैसी परियोजनाओं को नई गति मिल सकती है। इससे भारत के व्यापार और रणनीतिक हितों को मजबूती मिलेगी।
क्या पूरी तरह खत्म होगा तनाव?
दरअसल कई एक्सपर्ट्स मानना है कि समझौते की घोषणा के बावजूद अभी कई मुद्दे ऐसे हैं जिन पर अंतिम सहमति बनना बाकी है। लेबनान, यमन और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े कई सवाल अभी भी बने हुए हैं।
इसके बावजूद यदि अमेरिका और ईरान के बीच यह समझौता सफल रहता है तो यह केवल मध्य पूर्व ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक खबर होगी।
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