Congress Minister Ramalinga Reddy: कर्नाटक में नई कांग्रेस सरकार के गठन के कुछ ही समय बाद कैबिनेट के भीतर असंतोष सामने आ गया है। बताया जा रहा है की वरिष्ठ कांग्रेस नेता और आठ बार के विधायक रामलिंगा रेड्डी ने मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी नेतृत्व के लिए नई चुनौती खड़ी कर दी है। जिसके बाद रेड्डी ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने उन्हें 2023 में किया गया वादा पूरा नहीं किया और उनकी पसंद का विभाग नहीं दिया गया।
जानकारी के अनुसार, कैबिनेट विस्तार के बाद विभागों के बंटवारे को लेकर शुरू हुई यह नाराजगी अब खुलकर सामने आ चुकी है। राजनीतिक गलियारों में इसे कांग्रेस सरकार के लिए शुरुआती झटके के तौर पर देखा जा रहा है।
विभागों के बंटवारे से नाराज हुए रामलिंगा रेड्डी
रामलिंगा रेड्डी लंबे समय से बेंगलुरु की राजनीति में एक प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। उनका दावा है कि वर्ष 2023 में डीके शिवकुमार ने उनसे वादा किया था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें बेंगलुरु विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।
रेड्डी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि उन्होंने कभी स्वयं इस विभाग की मांग नहीं की थी। मुख्यमंत्री ने ही उन्हें यह मंत्रालय देने का आश्वासन दिया था, लेकिन जब विभागों का अंतिम बंटवारा हुआ तो उन्हें बेंगलुरु विकास मंत्रालय की जगह ‘वृहद और मध्यम सिंचाई विभाग’ सौंप दिया गया। जिसमें उन्होंने कहा कि यह केवल विभाग का मुद्दा नहीं है, बल्कि भरोसे और वादे का सवाल है। बार-बार याद दिलाने के बावजूद नेतृत्व ने अपना वादा पूरा नहीं किया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलकर जताई नाराजगी
मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद रामलिंगा रेड्डी ने मीडिया के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा कि शपथ ग्रहण समारोह से ठीक एक दिन पहले भी मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात हुई थी, जिसमें उन्हें दोबारा आश्वस्त किया गया था कि बेंगलुरु विकास मंत्रालय उन्हें ही मिलेगा।
रेड्डी ने कहा कि अंतिम समय में लिए गए फैसले ने उन्हें बेहद निराश किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे व्यक्तिगत रूप से किसी से नाराज नहीं हैं, लेकिन सिद्धांतों के खिलाफ जाकर पद पर बने रहना उनके लिए संभव नहीं है।

समर्थक के हाथ भेजा इस्तीफा
दरअसल दिलचस्प बात यह रही कि रामलिंगा रेड्डी ने अपना इस्तीफा सीधे मुख्यमंत्री को नहीं सौंपा। उन्होंने अपने एक समर्थक के माध्यम से मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव को इस्तीफा भिजवाया।
बता दें की अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि वह मंत्री पद देने के लिए मुख्यमंत्री और कांग्रेस पार्टी के आभारी हैं, लेकिन अपनी अंतरात्मा के खिलाफ काम नहीं कर सकते। इसलिए वे मंत्री पद छोड़ रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह विधायक और कांग्रेस कार्यकर्ता के रूप में पार्टी के लिए काम करते रहेंगे। इससे यह संकेत मिलता है कि उनकी नाराजगी सरकार के फैसले से है, पार्टी से नहीं।
बैठक छोड़कर बाहर निकल गए थे रेड्डी
सूत्रों के अनुसार, गुरुवार रात जब मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपने मंत्रियों को विभागों का आवंटन किया, तब रामलिंगा रेड्डी को जैसे ही अपने विभाग की जानकारी मिली, वह बैठक छोड़कर बाहर निकल गए थे। उसी समय से उनके असंतुष्ट होने की चर्चाएं शुरू हो गई थीं। बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर कर दी और मंत्री पद से इस्तीफा देने का फैसला कर लिया।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह घटनाक्रम कांग्रेस सरकार के भीतर चल रही खींचतान को उजागर करता है।
बेंगलुरु विकास मंत्रालय क्यों है खास?
बेंगलुरु विकास मंत्रालय राज्य की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक माना जाता है। बेंगलुरु देश के प्रमुख आईटी और स्टार्टअप केंद्रों में शामिल है। शहर के बुनियादी ढांचे, ट्रैफिक प्रबंधन, शहरी विकास और निवेश से जुड़े कई बड़े फैसले इसी मंत्रालय के अंतर्गत आते हैं।
रामलिंगा रेड्डी लंबे समय से बेंगलुरु की राजनीति से जुड़े रहे हैं और उन्हें उम्मीद थी कि उनके अनुभव को देखते हुए यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं होने पर उन्होंने खुलकर विरोध दर्ज कराया।
कांग्रेस सरकार के लिए बढ़ी चुनौती
नई सरकार बनने के तुरंत बाद किसी वरिष्ठ मंत्री का इस्तीफा देना कांग्रेस नेतृत्व के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है। रामलिंगा रेड्डी केवल वरिष्ठ नेता ही नहीं बल्कि पार्टी के मजबूत जनाधार वाले नेताओं में भी गिने जाते हैं। यदि उनकी नाराजगी जल्द दूर नहीं हुई तो यह अन्य असंतुष्ट नेताओं को भी अपनी मांगें उठाने का मौका दे सकती है। ऐसे में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार और कांग्रेस नेतृत्व पर स्थिति संभालने का दबाव बढ़ गया है।
क्या होगा अगला कदम?
ऐसे में अब सभी की नजर मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के अगले कदम पर टिकी हुई है। संभावना जताई जा रही है कि पार्टी नेतृत्व रामलिंगा रेड्डी को मनाने की कोशिश करेगा और किसी समझौते का रास्ता निकाला जा सकता है। हालांकि अभी तक मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यदि रेड्डी अपने फैसले पर कायम रहते हैं तो यह सरकार के लिए शुरुआती राजनीतिक संकट साबित हो सकता है।
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