Supreme Court Dismissed Meenakshi Natarajan Plea: कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा चुनाव से जुड़ी कानूनी लड़ाई में बड़ा झटका लगा है। बता दें की सुप्रीम कोर्ट ने उनके नामांकन पत्र को खारिज किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ मना कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उम्मीदवार को अपने खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी चुनावी हलफनामे में देना आवश्यक है और इस मामले में तथ्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मिली जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि मीनाक्षी नटराजन को तेलंगाना से जुड़े मामले की पूरी जानकारी थी। इसके बावजूद भी उन्होंने चुनावी हलफनामे में इस मामले का उल्लेख नहीं किया। जिसमें अदालत ने कहा कि यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता कि मामले में अभी आरोप तय (चार्ज फ्रेम) नहीं हुए थे, इसलिए जानकारी देना जरूरी नहीं था।
ऐसे में कोर्ट का कहना है कि उम्मीदवारों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने खिलाफ लंबित मामलों की जानकारी पूरी पारदर्शिता के साथ साझा करें ताकि मतदाताओं और संबंधित अधिकारियों के सामने सही तथ्य उपलब्ध रहें।
कांग्रेस की ओर से क्या दलील दी गई?
दरअसल सुनवाई के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और विवेक तन्खा ने पक्ष रखा। सिंघवी ने अदालत को बताया कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 33A के तहत केवल उन्हीं मामलों का खुलासा करना अनिवार्य होता है जिनमें अदालत आरोप तय कर चुकी हो। उन्होंने कहा कि जिस तेलंगाना मामले का उल्लेख किया जा रहा है, वह वर्ष 2022 का है। उस मामले में केवल नोटिस जारी हुआ था और अदालत ने अभी तक कोई संज्ञान नहीं लिया था। इसलिए इसे चुनावी हलफनामे में शामिल न करने को गलत नहीं माना जाना चाहिए।
सिंघवी ने यह भी कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर का फैसला असामान्य और विवादित है। उन्होंने अदालत से इस फैसले को रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि उनकी मुवक्किल केवल चुनाव लड़ने का अधिकार चाहती हैं।
मध्य प्रदेश सरकार ने किया विरोध
मध्य प्रदेश सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कांग्रेस की दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतों को सीमित परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप करना चाहिए।
रोहतगी ने कहा कि चुनाव लड़ना कोई मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। ऐसे मामलों में सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मांगी जा सकती। उन्होंने अदालत से याचिका खारिज करने की मांग की।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता दमा शेषाद्रि नायडू ने भी कांग्रेस उम्मीदवार के दावों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह आरोप सही नहीं है कि राज्यसभा चुनाव के नतीजे जल्दबाजी में घोषित किए गए। उन्होंने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 53(3) का उल्लेख करते हुए बताया कि यदि उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध सीटों से कम हो जाती है, तो चुनाव आयोग बिना मतदान कराए परिणाम घोषित कर सकता है। आयोग ने इसी कानूनी प्रावधान के तहत परिणाम घोषित किए हैं।

नामांकन रद्द होने का मामला क्या है?
मामला मीनाक्षी नटराजन के राज्यसभा चुनाव के नामांकन पत्र से जुड़ा है। जिसमें आरोप है कि उन्होंने अपने चुनावी हलफनामे में तेलंगाना से संबंधित एक लंबित मामले की जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन पत्र खारिज कर दिया था। नामांकन रद्द होने के बाद नटराजन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और फैसले को चुनौती दी। उन्होंने मांग की कि उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर दिया जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
अब मीनाक्षी नटराजन के पास क्या विकल्प हैं?
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद फिलहाल मीनाक्षी नटराजन को तत्काल राहत नहीं मिली है। अदालत ने संकेत दिया कि ऐसे मामलों के लिए कानून में अलग प्रक्रिया तय की गई है।
चुनाव आयोग ने भी कोर्ट को बताया कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 100(1)(c) के तहत उम्मीदवार अपना नामांकन रद्द किए जाने के फैसले को चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती दे सकते हैं। इसके लिए संबंधित हाई कोर्ट में याचिका दायर करनी होगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब नटराजन के सामने चुनाव याचिका दाखिल करना ही सबसे प्रमुख रास्ता बचा है।
कांग्रेस के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
मीनाक्षी नटराजन कांग्रेस की वरिष्ठ नेताओं में गिनी जाती हैं और पार्टी ने उन्हें राज्यसभा चुनाव में महत्वपूर्ण उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा था। ऐसे में उनका नामांकन रद्द होना कांग्रेस के लिए राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा झटका माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद विपक्षी दल भी इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठा सकते हैं। वहीं कांग्रेस का कहना है कि वह आगे उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी।
चुनावी हलफनामे को लेकर बढ़ी बहस
इस मामले ने एक बार फिर चुनावी हलफनामों में जानकारी देने की अनिवार्यता को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अदालतें पहले भी कई बार उम्मीदवारों को अपने खिलाफ लंबित मामलों, संपत्ति और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों का खुलासा करने की आवश्यकता पर जोर देती रही हैं।
ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि चुनावी पारदर्शिता लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है। इसलिए उम्मीदवारों को किसी भी प्रकार की जानकारी छिपाने से बचना चाहिए।
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