Mohan Bhagwat London Visit: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत इन दिनों लंदन का दौरा कर रहे हैं। इस दौरान उन्होंने लंदन में आयोजित ‘सेलिब्रेशन ऑफ वननेस’ कार्यक्रम में भी भाग लिया, जहां उन्होंने RSS प्रमुख ने बताई संघ की सोच के बारे में दुनिया को अवगत करवाया। उन्होंने संघ की विचारधारा, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र और युवाओं की भूमिका जैसे कई मुद्दों पर कार्यक्रम में खुलकर बात की। साथ ही उन्होंने लोगों के सवालों के जवाब देते हुए संघ को लेकर बनी कई धारणाओं पर भी अपनी बात भी रखी।
बता दें कि लदंन के इस कार्यक्रम में जब मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) से पूछा गया कि संघ के काम की सबसे बड़ी ताकत क्या है और दशकों बाद भी कौन सी चीज उसे मजबूती देती है, तो उन्होंने इसका जवाब ‘शुद्ध सात्विक प्रेम’ दिया। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य समाज में नफरत फैलाना नहीं है। इसके बजाय समाज के लोगों के बीच आत्मीयता, प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करना संघ के काम का आधार है।
‘नफरत नहीं, प्रेम संघ के काम की असली नींव’
मोहन भागवत ने कहा कि कुछ लोग संघ (Union) के काम को नफरत से जोड़ते हैं, लेकिन संघ की सोच इसके बिल्कुल विपरीत है। उनके मुताबिक समाज के प्रति बिना किसी स्वार्थ और द्वेष के आत्मीयता रखना ही संघ की मूल भावना है। इसी निस्वार्थ भाव के आधार पर संघ लंबे समय से समाज में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच अपनापन बढ़ता है, तो आपसी विश्वास मजबूत होता है। यही भावना समाज को जोड़ने और उसे आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मोहन भागवत ने बताया हिंदुत्व का मतलब
हिंदुत्व के सवाल पर संघ प्रमुख ने कहा कि इसे केवल किसी एक व्यक्ति या सीमित दायरे में नहीं देखा जा सकता है। उनके अनुसार हिंदू की सोच परिवार से शुरू होकर समुदाय, समाज और पूरी मानवता तक जाती है। उन्होंने प्रकृति के साथ हिंदू परंपरा (Hindu Tradition) के संबंध का भी जिक्र किया। भागवत ने कहा कि प्रकृति के प्रति केवल पूजा का भाव नहीं है, बल्कि उसके साथ प्रेम और जुड़ाव भी है। यही अपनापन और आपसी स्नेह एकता की बुनियाद बनता है। इसी से व्यक्ति के चरित्र और गुणों का विकास होता है और समाज मजबूत होता है।
युवाओं पर मोहन भागवत का भरोसा
आरएसएस प्रमुख (RSS Chief) ने नई पीढ़ी और युवाओं को लेकर भी बड़ा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज के युवाओं में दुनिया को बेहतर बनाने की इच्छा और ऊर्जा काफी ज्यादा है। इसलिए आने वाली पीढ़ी पर भरोसा किया जाना चाहिए।
भागवत के मुताबिक, युवाओं को सिर्फ यह बताने की जरूरत है कि (What is the Destination?) मंजिल क्या है? उनके अनुसार रास्ता तय करने का तरीका उन पर थोपना जरूरी नहीं है। युवा अपनी समझ और क्षमता के आधार पर सही मूल्यों और विकास के लक्ष्य को तेजी से हासिल कर सकते हैं।
‘हिंदू राष्ट्र’ का उद्देश्य क्या है?
लंदन में आयोजित कार्यक्रम में हिंदू राष्ट्र (Hindu Nation) को लेकर भी सवाल पूछा गया। इस पर मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्र को केवल प्रशासनिक व्यवस्था के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसके पीछे एक उद्देश्य भी होता है। उन्होंने कहा कि हिंदू राष्ट्र की सोच का उद्देश्य दुनिया को यह समझाना है कि विविधता स्वाभाविक है और एकता ही अंतिम सत्य है। उनके अनुसार अलग-अलग रूप, विचार और परंपराएं होने के बावजूद सभी के अस्तित्व का मूल एक है। भागवत ने कहा कि विविधता को खत्म करने के बजाय उसे स्वीकार करना और उसका सम्मान करना जरूरी है। अलग-अलग चीजों के बीच तालमेल बनाकर चलना ही प्रकृति के नियम (Laws of Nature) के अनुरूप है।
भारत से जुड़ाव और ग्लोबल सिटीजन की सोच
मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने विदेशों में रहने वाले भारतीयों और उनकी मातृभूमि से जुड़े रहने के सवाल पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति अपनी कर्मभूमि के प्रति पूरी निष्ठा रखते हुए अपनी मातृभूमि के लिए भी काम कर सकता है। वहीं, उन्होंने उदाहरण भी दिया और कहा कि अगर ब्रिटेन के प्रति वफादार रहते हुए किसी व्यक्ति के पास भारत की सेवा के लिए अतिरिक्त समय और संसाधन हैं, तो वह ऐसा कर सकता है। उनके मुताबिक मातृभूमि और कर्मभूमि के प्रति जिम्मेदारी निभाने के साथ खुद को एक ग्लोबल सिटीजन के रूप में देखना विरोधाभासी नहीं है।
‘अस्तित्व ही सत्य है’, भागवत ने समझाया हिंदू विचार
हिंदू सभ्यता (Hindu Civilization) ने दुनिया को क्या दिया और आज के मुश्किल दौर में इसकी प्रासंगिकता क्या है, इस सवाल पर भी मोहन भागवत ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हिंदू विचार मूल रूप से इस बात पर आधारित है कि अस्तित्व ही सत्य है। उन्होंने कहा कि दुनिया में अलग-अलग तरह की विविधताएं दिखाई देती हैं, लेकिन यह विविधता प्राकृतिक है। इसे स्वीकार करने और सम्मान देने की जरूरत है।
भागवत ने कहा कि इसी सोच के कारण किसी को खुद से अलग समझने के बजाय सभी के साथ जुड़कर आगे बढ़ना चाहिए। उनके मुताबिक समाज और दुनिया में बेहतर तालमेल के लिए एक-दूसरे को समझना और स्वीकार करना जरूरी है।
2 से 7 सितंबर तक लंदन दौरे पर हैं मोहन भागवत
वहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (Rashtriya Swayamsevak Sangh) की स्थापना वर्ष 1925 में हुई थी और संघ अपनी शताब्दी के दौर से गुजर रहा है। इसी क्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत 2 से 7 सितंबर 2026 तक लंदन के दौरे पर हैं। उनके इस दौरे के दौरान हिंदू विचार, भारतीय संस्कृति, सामाजिक एकता और वैश्विक स्तर पर भारतीय समुदाय से जुड़े विषयों पर संवाद किया जा रहा है। लंदन में ‘सेलिब्रेशन ऑफ वननेस’ (Celebration of Oneness) कार्यक्रम के दौरान भागवत के बयान में प्रेम, आत्मीयता, विविधता के सम्मान और समाज को जोड़ने की सोच पर खास जोर दिखाई दिया।
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