PM Modi Carbon Emissions: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन को लेकर वैश्विक स्तर पर जिम्मेदारी तय करने के तरीके पर सवाल उठाया है। बता दें कि आज शनिवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘द फ्यूचर ऑफ एनवायरनमेंट एंड क्लाइमेट डायनेमिक्स’ (The Future of Environment and Climate Dynamics) के उद्घाटन के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी अक्सर विकासशील देशों पर गलत तरीके से डाल दी जाती है। उन्होंने भारत के प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन का आंकड़ा सामने रखते हुए विकसित और विकासशील देशों के बीच अंतर को रेखांकित किया।
वहीं, यह दो दिवसीय सम्मेलन राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी NGT की ओर से आयोजित किया जा रहा है। इसमें पर्यावरण और जलवायु से जुड़े मुद्दों पर भारत समेत 17 देशों के न्यायिक प्रतिनिधि, विशेषज्ञ और अन्य हितधारक हिस्सा ले रहे हैं। ऐसे में आइए जानते हैं यहां पूरी जानकारी
पीएम मोदी ने विकसित देशों के उत्सर्जन पर क्या कहा?
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन अभी भी वैश्विक औसत के आधे से कम है। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद विकासशील देशों पर जलवायु परिवर्तन और कार्बन उत्सर्जन की जिम्मेदारी अक्सर अधिक डाल दी जाती है।
पीएम मोदी के अनुसार, विकसित देशों का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत के मुकाबले करीब छह गुना अधिक है। उन्होंने कहा कि भारत इस अंतर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार सामने रखता रहा है। ऐसे में उनका यह बयान मुख्य फोकस जलवायु न्याय और देशों की अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखकर जिम्मेदारी तय करने पर रहा। साथ ही, उनका कहना था कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए विकासशील देशों की विकास संबंधी जरूरतों को भी समझना होगा।
India is showing how development and environmental sustainability can go hand in hand. Speaking at the International Conference on "The Future of Environment and Climate Dynamics." https://t.co/QTmc4v8yeT
— Narendra Modi (@narendramodi) September 19, 2026
किस ओर था पीएम मोदी का इशारा?
पीएम मोदी ने अपने भाषण में किसी एक देश का नाम लेकर निशाना नहीं साधा। उनका बयान व्यापक तौर पर वैश्विक जलवायु व्यवस्था में विकसित और विकासशील देशों की अलग-अलग जिम्मेदारियों के संदर्भ में था। हालांकि, यह बयान ऐसे समय आया है जब नेपाल में हालिया विनाशकारी बाढ़ के बाद जलवायु परिवर्तन और बड़े उत्सर्जक देशों की जिम्मेदारी को लेकर बहस तेज हुई है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल की शुरुआती टिप्पणियों के बाद भारत, चीन और अमेरिका समेत बड़े उत्सर्जक देशों की भूमिका को लेकर चर्चा हुई थी। बाद में खनाल ने स्पष्ट किया था कि नेपाल सरकार ने भारत, चीन या अमेरिका से औपचारिक तौर पर जलवायु मुआवजे की मांग नहीं की है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने भी बाढ़ को जलवायु संकट के संदर्भ में देखने और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से सहयोग की जरूरत पर जोर दिया है। 26 अगस्त को भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद नेपाल ने जलवायु संकट से जुड़े जोखिमों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया है।
भारत की पर्यावरण नीति पर PM मोदी ने क्या बताया?
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में भारत में पिछले करीब 12 वर्षों के दौरान पर्यावरण के क्षेत्र में हुए बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की दिशा में काम किया है।
पीएम मोदी ने खास तौर पर नवीकरणीय ऊर्जा को भारत की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि देश ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से विस्तार किया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, भारत की सौर क्षमता 2014 के आसपास करीब 2.8 गीगावाट से बढ़कर अगस्त 2026 तक करीब 168 गीगावाट हो गई है। साथ ही, उन्होंने कहा कि भारत का विकास तेज होने के साथ-साथ टिकाऊ भी है। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक और ऊर्जा के नए स्रोतों को बढ़ावा देने की जरूरत पर जोर दिया।
भारत ने पेरिस समझौते के लक्ष्य को लेकर क्या कहा?
पीएम मोदी ने अपने भाषण में भारत के अंतरराष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि G20 देशों में भारत ऐसा देश है जिसने पेरिस जलवायु समझौते के तहत तय प्रतिबद्धताओं को समयसीमा से पहले पूरा किया है। यह दावा प्रधानमंत्री कार्यालय और PIB की ओर से जारी उनके संबोधन के विवरण में भी दर्ज है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण केवल नीतियों का विषय नहीं है, बल्कि इसके लिए समाज, सरकार, न्यायपालिका, वैज्ञानिक समुदाय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बीच सहयोग भी जरूरी है।
जलवायु परिवर्तन पर भारत का क्या रुख है?
भारत लंबे समय से जलवायु परिवर्तन की वैश्विक बहस में समानता और न्याय के मुद्दे को उठाता रहा है। भारत का तर्क रहा है कि सभी देशों की परिस्थितियां और ऐतिहासिक योगदान समान नहीं हैं, इसलिए जलवायु कार्रवाई में विकासशील देशों की विकास जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। वहीं, जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक स्तर पर यह बहस भी जारी है कि मौजूदा उत्सर्जन, ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को जिम्मेदारी तय करते समय किस तरह महत्व दिया जाए।
पीएम मोदी के विज्ञान भवन में दिए गए भाषण ने इसी व्यापक बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है। उनके बयान का संदेश यह रहा कि जलवायु संकट से निपटने की जिम्मेदारी साझा होनी चाहिए, लेकिन विकासशील देशों की परिस्थितियों और प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
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