Abhishek Banerjee Office Case: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) को कोलकाता हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। बताया जा रहा है की अदालत ने उनके डायमंड हार्बर क्षेत्र से जुड़े ऑफिस पर प्रस्तावित बुलडोजर कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। जिसमें हाई कोर्ट ने साफ कहा है मामले की अगली सुनवाई तक भवन को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में एक बार फिर इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
जानकारी के लिए बता दें यह मामला उस समय सुर्खियों में आया जब दक्षिण 24 परगना जिला प्रशासन ने कथित अवैध निर्माण का हवाला देते हुए भवन को गिराने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। इसके बाद भवन की मालिक कंपनी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और तत्काल राहत की मांग की।
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, डायमंड हार्बर के आमतला इलाके में स्थित एक भवन को लेकर विवाद चल रहा है। प्रशासन का दावा है कि यह इमारत बिना वैध नक्शे और आवश्यक अनुमतियों के बनाई गई है। इसी आधार पर जिला प्रशासन ने भवन को अवैध घोषित करते हुए उसे हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी। दूसरी ओर, भवन की मालिक कंपनी लीप्स एंड बाउंड्स ने इस कार्रवाई को गलत बताते हुए कोलकाता हाई कोर्ट में याचिका दायर की। कंपनी का कहना है कि प्रशासन ने कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन नहीं किया और जल्दबाजी में बुलडोजर कार्रवाई शुरू कर दी।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
दरअसल आज रविवार को खास सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजा बसु चौधरी की अदालत ने मामले पर अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक भवन पर किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या बुलडोजर कार्रवाई नहीं की जाएगी। साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों से भवन से जुड़े सभी जरूरी दस्तावेज पेश करने को कहा है। कोर्ट यह भी देखेगा कि निर्माण वास्तव में नियमों के खिलाफ हुआ है या नहीं और प्रशासन ने कार्रवाई के दौरान कानूनी प्रक्रिया का पालन किया या नहीं। हाई कोर्ट का यह आदेश फिलहाल भवन को राहत देता है, जबकि मामले की विस्तृत सुनवाई आगे जारी रहेगी।
ईडी का क्या है दावा?
इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) का भी नाम सामने आया है। जिसमें ईडी का दावा है कि भवन की मालिक कंपनी लीप्स एंड बाउंड्स से अभिषेक बनर्जी जुड़े हुए हैं और वे कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) रहे हैं।
हालांकि इस मामले में अभी अदालत ने किसी भी पक्ष के दावों पर अंतिम टिप्पणी नहीं की है। फिलहाल अदालत केवल बुलडोजर कार्रवाई की वैधता और प्रशासनिक प्रक्रिया की जांच कर रही है।
प्रशासन का पक्ष
दक्षिण 24 परगना जिला प्रशासन का कहना है कि संबंधित भवन निर्माण नियमों का उल्लंघन करके बनाया गया है। अधिकारियों के अनुसार भवन के लिए वैध नक्शा और जरूरी मंजूरी उपलब्ध नहीं थी, इसलिए कानून के तहत कार्रवाई की गई।
प्रशासन का कहना है कि अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाने के लिए नहीं, बल्कि नियमों के पालन के लिए की जा रही है।

अभिषेक बनर्जी ने लगाए गंभीर आरोप
बता दें हाई कोर्ट के आदेश के बाद अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दी। जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि उनके कार्यालय के खिलाफ की गई कार्रवाई राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि प्रशासन और भारतीय जनता पार्टी (BJP) मिलकर उन्हें निशाना बना रहे हैं। उनका आरोप है कि बुलडोजर कार्रवाई के दौरान कार्यालय में रखा सामान भी नुकसान पहुंचाया गया।
अभिषेक बनर्जी ने दावा किया कि कार्यालय से लैपटॉप, प्रिंटर, दस्तावेज, मेज और कुर्सियां भी हटाई गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पूरी कार्रवाई कानून के दायरे से बाहर जाकर की गई।
बीजेपी और टीएमसी के बीच बढ़ा राजनीतिक विवाद
इस मामले के सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। टीएमसी इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है, जबकि बीजेपी का कहना है कि यदि किसी निर्माण में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होना स्वाभाविक है।
ऐसे में दोनों दलों के बीच यह विवाद अब कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गया है।
बुलडोजर कार्रवाई पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल
देश के अलग-अलग राज्यों में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर पहले भी कई कानूनी विवाद सामने आ चुके हैं। कई मामलों में अदालतों ने यह स्पष्ट किया है कि किसी भी भवन को गिराने से पहले संबंधित व्यक्ति या संस्था को उचित नोटिस देना और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
इसी कारण अभिषेक बनर्जी से जुड़े इस मामले में भी हाई कोर्ट यह जांच करेगा कि प्रशासन ने सभी आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया या नहीं।
अब आगे क्या होगा?
हाई कोर्ट ने फिलहाल केवल अंतरिम राहत दी है। अब अगली सुनवाई में भवन से जुड़े सभी दस्तावेज, निर्माण की अनुमति, नक्शा और प्रशासन की कार्रवाई से जुड़े रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश किए जाएंगे।
यदि अदालत को लगता है कि नियमों का पालन नहीं हुआ है, तो आगे अलग आदेश जारी किए जा सकते हैं। वहीं यदि प्रशासन की कार्रवाई कानून के अनुरूप पाई जाती है, तो आगे की कार्रवाई पर भी फैसला लिया जाएगा। इसलिए फिलहाल यह मामला पूरी तरह न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और अंतिम फैसला आने तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
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