Assam UCC Bill 2026: असम की राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राज्य सरकार ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक 2026 पेश कर दिया है. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार द्वारा लाया गया यह विधेयक राज्य की राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है. बिल पेश होते ही विधानसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली. संसदीय कार्य मंत्री अतुल बोरा ने मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की ओर से यह विधेयक सदन में रखा. सरकार का कहना है कि यह कानून राज्य में विवाह, तलाक, संपत्ति के अधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा.
क्या है UCC Bill 2026?
यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का मतलब है कि सभी धर्मों के लोगों के लिए व्यक्तिगत मामलों में एक समान कानून लागू हो. इसमें शादी, तलाक, गोद लेना, संपत्ति का बंटवारा और पारिवारिक अधिकार शामिल होते हैं. फिलहाल भारत में अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू हैं. हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों के अपने अलग कानून हैं. UCC लागू होने के बाद इन सभी मामलों में समान कानूनी ढांचा तैयार किया जाएगा. असम सरकार का दावा है कि इससे महिलाओं के अधिकार मजबूत होंगे और समाज में समानता बढ़ेगी.
हिमंता सरकार का बड़ा चुनावी वादा
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले ही विधानसभा चुनाव के दौरान यह घोषणा कर चुके थे कि दोबारा सत्ता में आने पर उनकी सरकार UCC कानून लाएगी. अब विधानसभा में बिल पेश कर सरकार ने अपने सबसे बड़े चुनावी वादों में से एक को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाया है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा लंबे समय से UCC को अपने वैचारिक एजेंडे का हिस्सा मानती रही है. असम के बाद अब देश के अन्य भाजपा शासित राज्यों में भी इस विषय पर चर्चा तेज हो सकती है.
बिल में क्या-क्या प्रावधान?
असम UCC Bill 2026 में कई अहम प्रावधान शामिल किए गए है. इनमें विवाह पंजीकरण को अनिवार्य बनाना, बहुविवाह पर रोक और लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी दायरे में लाना प्रमुख माना जा रहा है. सरकार के मुताबिक बिल में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित की गई है. इसके अलावा एक से अधिक शादी पर प्रतिबंध लगाने की भी तैयारी है. विधेयक में विवाह और तलाक से जुड़े मामलों के लिए एक समान प्रक्रिया लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है. साथ ही संपत्ति और उत्तराधिकार के अधिकारों में भी समानता सुनिश्चित करने की बात कही गई है.
लिव-इन रिलेशनशिप पर भी नियम
असम UCC Bill में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी कानूनी प्रावधान शामिल किए गए हैं. सरकार का कहना है कि इससे महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों को मजबूत करने में मदद मिलेगी. सूत्रों के मुताबिक, लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को पंजीकरण कराना पड़ सकता है ताकि भविष्य में किसी तरह के विवाद की स्थिति में कानूनी सुरक्षा मिल सके.
विपक्ष ने क्यों किया विरोध?
विधानसभा में बिल पेश होते ही विपक्षी दलों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. कांग्रेस, एआईयूडीएफ और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि सरकार बिना व्यापक चर्चा के ऐसा बड़ा कानून लागू करना चाहती है. विपक्ष का कहना है कि इस बिल का असर राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं पर पड़ सकता है. कई नेताओं ने कहा कि आदिवासी समुदायों और अल्पसंख्यक समूहों की राय लिए बिना ऐसा कानून लाना उचित नहीं है. कुछ विपक्षी विधायकों ने यह भी मांग की कि बिल को पहले सिलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाए और सभी पक्षों से चर्चा के बाद ही इसे पारित किया जाए.
विधानसभा में हंगामे के आसार
असम विधानसभा का विशेष सत्र 21 मई से 26 मई तक चल रहा है. माना जा रहा है कि मंगलवार को इस बिल पर विस्तृत चर्चा हो सकती है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि UCC जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सदन में तीखी बहस और हंगामे की संभावना बनी हुई है. भाजपा जहां इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक एजेंडा करार दे रहा है.
महिलाओं के अधिकार पर सरकार का जोर
असम सरकार का कहना है कि UCC Bill महिलाओं को समान अधिकार देने के उद्देश्य से लाया गया है. सरकार का दावा है कि कई व्यक्तिगत कानूनों में महिलाओं को बराबरी के अधिकार नहीं मिल पाते. मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा पहले भी कई बार कह चुके हैं कि बहुविवाह और बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याओं को खत्म करने के लिए सख्त कानून जरूरी हैं. सरकार का मानना है कि समान नागरिक संहिता से महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति मजबूत होगी.
क्या आदिवासी समुदाय होंगे बाहर?
सूत्रों के अनुसार सरकार आदिवासी समुदायों और पारंपरिक जनजातीय कानूनों को लेकर अलग व्यवस्था पर विचार कर सकती है. हालांकि अभी तक सरकार ने इस पर पूरी स्पष्टता नहीं दी है. पूर्वोत्तर राज्यों में कई जनजातीय समुदायों की अपनी पारंपरिक न्याय व्यवस्था और सामाजिक नियम हैं. ऐसे में UCC को लेकर वहां अलग तरह की बहस भी चल रही है.
देशभर में फिर तेज हुई UCC पर बहस
असम में UCC Bill पेश होने के बाद देशभर में समान नागरिक संहिता पर चर्चा तेज हो गई है. इससे पहले उत्तराखंड UCC कानून लागू करने वाला पहला राज्य बन चुका है. भाजपा शासित कई राज्यों में UCC को लेकर अध्ययन समितियां बनाई जा चुकी हैं. वहीं विपक्षी दल इसे संविधान की विविधता की भावना के खिलाफ बता रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और बड़ा रूप ले सकता है.
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक UCC लागू करना आसान नहीं है क्योंकि भारत विविधताओं वाला देश है. अलग-अलग समुदायों की परंपराएं और धार्मिक मान्यताएं अलग हैं. हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए समान कानून जरूरी हो सकते हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को सभी समुदायों से व्यापक चर्चा और सहमति के बाद ही ऐसा कानून लागू करना चाहिए.
राजनीतिक असर भी अहम
असम में UCC Bill का असर केवल कानूनी और सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका राजनीतिक प्रभाव भी बड़ा हो सकता है. भाजपा इसे अपने समर्थकों के बीच मजबूत संदेश के तौर पर पेश कर रही है. वहीं विपक्ष इसे ध्रुवीकरण की राजनीति बता रहा है. आने वाले समय में यह मुद्दा पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीति में भी अहम भूमिका निभा सकता है.
क्या जल्द कानून बन जाएगा?
विधानसभा में भाजपा के पास बहुमत है, ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार इस बिल को आसानी से पारित करा सकती है. हालांकि विपक्ष लगातार इस पर व्यापक चर्चा की मांग कर रहा है. अगर यह विधेयक पास हो जाता है तो असम देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां UCC लागू करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है.
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