FCRA Bill 2026: विदेशी चंदे और गैर सरकारी संगठनों यानी NGOs को मिलने वाली फंडिंग से जुड़े Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को लेकर विवाद बढ़ता नजर आ रहा है। जिसमें प्रस्तावित FCRA संशोधनों पर अमेरिकी सांसद राइली मूर की आपत्ति के बाद भारत के विदेश मंत्रालय यानी MEA ने साफ प्रतिक्रिया दी है। मंत्रालय ने अमेरिकी सांसद की टिप्पणी को खारिज करते हुए कहा कि भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर कानून बनाना और उसमें बदलाव करना देश का आंतरिक मामला है।
जानकारी के लिए बता दें विदेश मंत्रालय ने यह भी याद दिलाया कि भारत अकेला ऐसा देश नहीं है, जहां विदेशी फंडिंग को लेकर नियम बनाए गए हैं। अमेरिका समेत कई देशों में विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए अलग-अलग कानून और नियम लागू हैं।
क्या है FCRA Bill 2026?
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act का मुख्य उद्देश्य भारत में आने वाली विदेशी फंडिंग को काबू करना है। इसके तहत NGOs, सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक संगठनों और अन्य संस्थाओं को विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन के इस्तेमाल को लेकर नियमों का पालन करना पड़ता है।
सरकार की ओर से प्रस्तावित संशोधनों में विदेशी फंडिंग हासिल करने वाली संस्थाओं के लिए नियमों को और स्पष्ट और सख्त बनाने की बात कही गई है। सरकार का तर्क है कि विदेशी धन से जुड़ी गतिविधियों में पारदर्शिता जरूरी है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विदेशी फंड का इस्तेमाल कानून के अनुसार ही हो। प्रस्तावित बदलावों में FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म होने, रिन्यू नहीं होने या संस्था की ओर से रजिस्ट्रेशन सरेंडर किए जाने की स्थिति से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं।
FCRA रजिस्ट्रेशन खत्म होने पर क्या होगा?
प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार अगर किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, उसका रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं होता या संस्था खुद अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर कर देती है, तो उससे जुड़ी विदेशी फंडिंग और कुछ संपत्तियों को लेकर नया प्रावधान लागू हो सकता है। बता दें ऐसी स्थिति में संबंधित विदेशी फंड या संपत्ति को नामित प्राधिकरण यानी Designated Authority के अधीन किए जाने का प्रावधान प्रस्तावित है। इसके बाद इन संपत्तियों के इस्तेमाल को लेकर सरकार की भूमिका अहम हो सकती है।
सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य विदेशी फंडिंग से तैयार की गई सार्वजनिक उपयोग की संपत्तियों को असुरक्षित होने से बचाना है। यानी यदि किसी संस्था का FCRA दर्जा खत्म हो जाता है, तो विदेशी फंड से बनी संपत्तियों को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट रहे।
विदेशी फंड खर्च करने के लिए भी तय होगी समयसीमा
प्रस्तावित FCRA संशोधनों में विदेशी फंड को अपने पास रखने और उसका इस्तेमाल करने को लेकर भी समयसीमा तय किए जाने की बात कही गई है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी स्रोतों से मिला पैसा लंबे समय तक बिना स्पष्ट उद्देश्य के किसी संस्था के पास न पड़ा रहे।
ऐसे में अगर किसी संस्था के FCRA रजिस्ट्रेशन या विदेशी फंड से जुड़े नियमों पर सरकार की ओर से कार्रवाई होती है, तो संस्था को अपनी संपत्ति के ट्रांसफर या बिक्री से जुड़े अधिकारों पर भी प्रतिबंध का सामना करना पड़ सकता है। इससे सरकार को यह सुनिश्चित करने में मदद मिलने की उम्मीद है कि किसी संस्था के खिलाफ कार्रवाई की स्थिति में विदेशी फंड से जुड़ी संपत्तियों को दूसरी जगह ट्रांसफर न किया जा सके।

FCRA मामलों की जांच को लेकर भी बदलाव
प्रस्तावित संशोधनों में FCRA से जुड़े मामलों की जांच को लेकर भी प्रावधानों में बदलाव की बात सामने आई है। ऐसे मामलों में जांच शुरू करने से पहले सरकार की अनुमति को जरूरी किए जाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा अगर किसी संस्था में FCRA के नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो केवल संस्था को ही जिम्मेदार नहीं माना जाएगा। संस्था के डायरेक्टर, ट्रस्टी और संबंधित पदाधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है। इस प्रावधान का मकसद यह तय करना है कि संस्था के संचालन के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी सुनिश्चित हो।
सजा के प्रावधान में भी बदलाव
FCRA Bill 2026 में नियमों के उल्लंघन से जुड़े दंड के प्रावधान में भी बदलाव प्रस्तावित है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कुछ मामलों में सजा की अधिकतम अवधि को पांच साल से घटाकर एक साल किए जाने का प्रस्ताव है।
इस तरह बिल में एक तरफ विदेशी फंडिंग और संपत्तियों की निगरानी को लेकर सख्ती बढ़ाने की बात है, वहीं कुछ अपराधों में सजा की अवधि को कम करने का प्रस्ताव भी रखा गया है।
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने क्यों जताई आपत्ति?
FCRA Bill 2026 को लेकर अमेरिकी सांसद राइली मूर ने चिंता जताई है। जिसमें उन्होंने दावा किया है कि अगर चर्च और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द होता है, तो प्रस्तावित प्रावधानों के जरिए सरकार उनकी संपत्तियों और गतिविधियों पर अधिक नियंत्रण हासिल कर सकती है।
मूर ने इन प्रस्तावित बदलावों को ईसाई समुदाय से जोड़ते हुए चिंता जाहिर की और भारत सरकार से FCRA में प्रस्तावित संशोधनों पर दोबारा विचार करने की अपील की है। जिसमें उनका कहना था कि ऐसे प्रावधान भारत में धार्मिक संस्थाओं और चैरिटी संगठनों को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि इससे भारत और अमेरिका के संबंधों पर असर पड़ सकता है।
MEA ने दिया जवाब
अमेरिकी सांसद की टिप्पणी पर भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ कर दिया कि विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाना भारत का आंतरिक मामला है।
MEA के मुताबिक भारत अपने कानून और नीतियां अपनी जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाता है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि विदेशी फंडिंग को काबू करने के लिए केवल भारत में ही नियम नहीं हैं, बल्कि अमेरिका सहित कई देशों में विदेशी धन के प्रवाह और इस्तेमाल को लेकर कानून मौजूद हैं।
भारत सरकार का कहना है कि FCRA में प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग से जुड़ी संस्थाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
सरकार और अमेरिकी सांसद के दावों में अंतर
FCRA Bill 2026 को लेकर भारत सरकार और अमेरिकी सांसद के रुख में स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सांसद जहां प्रस्तावित प्रावधानों के धार्मिक संस्थाओं पर संभावित प्रभाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं, वहीं भारत सरकार इसे विदेशी फंडिंग और उससे जुड़ी संपत्तियों की निगरानी से जोड़कर देख रही है।
सरकार का तर्क है कि विदेशी स्रोतों से मिलने वाले धन का इस्तेमाल देश के कानूनों के मुताबिक होना चाहिए। वहीं आलोचकों की चिंता है कि कड़े प्रावधानों से NGOs और धार्मिक संस्थाओं के कामकाज पर सरकार का नियंत्रण बढ़ सकता है। ऐसे में अब नजर इस बात पर होगी कि FCRA Bill 2026 को लेकर संसद में आगे किस तरह की चर्चा होती है और प्रस्तावित प्रावधानों में कोई बदलाव किया जाता है या नहीं।
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