CEC Gyanesh Kumar: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पूर्व IAS अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने मोर्चा खोल दिया है। बता दें 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर ‘पीपुल्स महाभियोग’ (People’s Impeachment) नोटिस और चार पेज की चार्जशीट तैयार की थी। इसमें SIR, मतदाता सूची में बदलाव, ECINET और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, प्रतिनिधिमंडल जब चुनाव आयोग के कार्यालय पहुंचा तो उसे अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली। पूर्व अधिकारियों ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे संविधान और कानून की भावना के खिलाफ बताया है। ऐसे में आइए यहां पढ़ें पूरी खबर
क्या है ‘पीपुल्स महाभियोग’ नोटिस?
पूर्व अधिकारियों और एक्टिविस्ट्स के इस समूह ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चार पेज का नोटिस तैयार किया था। इसमें उनके खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। समूह ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया को कमजोर किया गया और कई महत्वपूर्ण फैसलों में पर्याप्त चर्चा और परामर्श नहीं हुआ।
नोटिस में वैधानिक फॉर्म 6 में बदलाव को मंजूरी देने, ECINET के माध्यम से मतदाता सूची के प्रशासन को केंद्रीकृत करने और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
समूह का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा CEC पर राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता करने और बार-बार वैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन करने के आरोप भी लगाए गए हैं।
SIR को लेकर उठाए गए सवाल
नोटिस में सबसे गंभीर सवाल SIR (Special Intensive Revision) को लेकर उठाए गए हैं। समूह का दावा है कि चुनाव आयोग के भीतर जरूरी चर्चा, परामर्श और रिकॉर्डेड कार्यवाही के बिना SIR से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले लिए गए।
प्रतिनिधिमंडल ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ फैसलों को लेकर दूसरे चुनाव आयुक्तों की ओर से आपत्तियां दर्ज की गई थीं। समूह का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था में बड़े फैसले पारदर्शी तरीके से और सभी संबंधित सदस्यों की सहमति एवं विचार-विमर्श के बाद होने चाहिए।
पूर्व अधिकारियों का कहना है कि मतदाता सूची में बदलाव सीधे नागरिकों के वोट देने के अधिकार से जुड़ा विषय है। ऐसे में किसी भी प्रक्रिया को लागू करते समय यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि योग्य मतदाता अपने मताधिकार से वंचित न हों।

EC ऑफिस के बाहर क्यों रोका गया प्रतिनिधिमंडल?
अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग को पहले से जानकारी थी कि पूर्व सिविल सेवकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधिमंडल वहां आने वाला है। इसके बावजूद चुनाव आयोग मुख्यालय की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेडिंग कर दी गई। उन्होंने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने आए लोगों को रोकना कानून और संविधान की भावना के खिलाफ है। समूह का उद्देश्य चुनाव आयोग को अपना नोटिस और आरोपों से जुड़ा दस्तावेज सौंपना था। हालांकि, प्रतिनिधिमंडल को कार्यालय के अंदर प्रवेश नहीं मिल सका और उनका यह प्रयास सफल नहीं हो पाया।
नजीब जंग ने क्या कहा?
दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने भी इस पूरे मामले पर अपनी बात रखी। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि पूर्व सिविल सेवकों ने अपने पूरे करियर में संविधान को बनाए रखने की शपथ ली थी। उनका कहना था कि अब जब उन्हें संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर चिंता महसूस हो रही है, तो वे अपनी आवाज उठा रहे हैं।
नजीब जंग ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाना नहीं है। उनका कहना था कि मुद्दा CEC के आचरण और SIR की प्रक्रिया से जुड़ा है। उन्होंने दावा किया कि SIR के दौरान अगर किसी व्यक्ति को उसके वोटिंग अधिकार से वंचित किया जाता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
विपक्ष भी लगातार उठा रहा है मुद्दा
CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्षी दल भी लगातार सवाल उठाते रहे हैं। खासतौर पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण और SIR की प्रक्रिया को लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। वहीं, चुनाव आयोग की भूमिका और उसके फैसलों को लेकर लगातार राजनीतिक बहस भी तेज है। ऐसे में पूर्व IAS अधिकारियों और एक्टिविस्ट्स का यह कदम इस विवाद को और चर्चा में ले आया है।
फिलहाल, प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के कार्यालय में प्रवेश कर अपना नोटिस नहीं सौंप सका। लेकिन चार पेज के इस दस्तावेज में लगाए गए आरोपों और SIR को लेकर उठाए गए सवालों ने एक बार फिर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही पर बहस तेज कर दी है।



