Manmohan Singh: एक समय ऐसा था जब भारत में सरकार यह तय करती थी कि कोई व्यक्ति कितना सोना अपने पास रख सकता है. आज यह बात सुनकर हैरानी हो सकती है, लेकिन 1968 में लागू हुआ गोल्ड कंट्रोल एक्ट देश के सबसे सख्त आर्थिक कानूनों में से एक माना जाता था. बाद में 1990-91 के आर्थिक सुधारों के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने इस कानून को खत्म कर दिया. अब एक बार फिर सोने की बढ़ती कीमतों और आयात को लेकर बहस तेज हो गई है.
क्यों फिर चर्चा में आया पुराना कानून?
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल के दिनों में लोगों से अपील की है कि वे जरूरत न हो तो सोना खरीदने से बचें. सरकार लगातार गोल्ड इंपोर्ट कम करने के लिए टैक्स बढ़ा रही है और लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रही है. इसी बीच अब पुराने गोल्ड कंट्रोल एक्ट की चर्चा फिर शुरू हो गई है.
क्या था गोल्ड कंट्रोल एक्ट?
1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की सरकार ने गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया था. उस समय भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और विदेशी मुद्रा भंडार बेहद सीमित था. सरकार को डर था कि लोग बड़ी मात्रा में सोना खरीद रहे हैं, जिससे देश का डॉलर बाहर जा रहा है.
सोना सिर्फ गहना नहीं, सुरक्षा भी
भारत में सोना हमेशा सिर्फ आभूषण नहीं रहा. यह बचत, सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है. शादी-ब्याह से लेकर मुश्किल समय तक भारतीय परिवार सोने को सबसे भरोसेमंद संपत्ति मानते रहे हैं.
कानून में क्या-क्या पाबंदियां थीं?
गोल्ड कंट्रोल एक्ट के तहत बिना लाइसेंस के सोना खरीदना, बेचना या व्यापार करना गैरकानूनी बना दिया गया था. ज्वेलर्स को भी लाइसेंस लेना जरूरी था. सोने की ईंटों और सिक्कों पर भी सख्त नियंत्रण लगा दिया गया था.
कितनी थी सोना रखने की सीमा?
उस दौर में शादीशुदा महिला केवल 500 ग्राम सोना रख सकती थी. अविवाहित महिला को 250 ग्राम तक की अनुमति थी. वहीं पुरुष सिर्फ 100 ग्राम सोना रख सकते थे.
जेल तक हो सकती थी
अगर कोई व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता था तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होती थी. सोने की तस्करी और अवैध व्यापार पर जेल भेजने तक का प्रावधान था. सरकार का मकसद था कि देश से विदेशी मुद्रा बाहर जाने से रोकी जाए.
लेकिन सरकार की योजना क्यों फेल हुई?
सरकार ने सोचा था कि पाबंदियों से लोग कम सोना खरीदेंगे. लेकिन हुआ इसका उल्टा. भारत में सोने की मांग कम नहीं हुई और तस्करी तेजी से बढ़ने लगी.
तस्करों का बढ़ा नेटवर्क
1970 और 1980 के दशक में दुबई और दूसरे देशों से सोने की तस्करी तेजी से बढ़ी. तस्कर भारी मुनाफा कमाने लगे. ब्लैक मार्केट में सोना खुलेआम बिकने लगा.
लोगों का भरोसा बैंक से ज्यादा सोने पर
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार एक बात समझ नहीं पाई थी. भारतीय लोग बैंकिंग सिस्टम पर शक कर सकते हैं, लेकिन सोने पर नहीं. यही वजह थी कि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद लोग सोना खरीदते रहे.
फिर आया आर्थिक सुधारों का दौर
1990-91 में भारत गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था. देश का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम हो गया था. इसी दौर में तत्कालीन वित्त मंत्री Manmohan Singh ने बड़े आर्थिक सुधार शुरू किए.
क्यों खत्म किया गया कानून?
मनमोहन सिंह ने माना कि गोल्ड कंट्रोल एक्ट अपना उद्देश्य पूरा करने में नाकाम रहा है. इसके कारण अवैध कारोबार और तस्करी बढ़ी, जबकि सरकार को राजस्व का नुकसान हुआ. इसी वजह से इस कानून को खत्म कर दिया गया.
कानून हटने के बाद क्या बदला?
गोल्ड कंट्रोल एक्ट खत्म होने के बाद सोने का कारोबार धीरे-धीरे व्यवस्थित होने लगा. ज्वेलरी उद्योग को बढ़ावा मिला और तस्करी में भी कुछ कमी आई. भारत दुनिया के सबसे बड़े गोल्ड बाजारों में शामिल हो गया.
अब फिर क्यों बढ़ी चिंता?
आज भारत दुनिया में सबसे ज्यादा सोना खरीदने वाले देशों में शामिल है. सरकार को चिंता है कि बढ़ते गोल्ड इंपोर्ट से विदेशी मुद्रा भंडार और करंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव बढ़ सकता है. इसी वजह से सरकार लगातार इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा रही है.
टैक्स बढ़ने से क्या असर?
हाल ही में सरकार ने सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी में बड़ी बढ़ोतरी की है. इससे सोना महंगा हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे लोगों की खरीदारी कुछ हद तक कम हो सकती है.
क्या फिर लौट सकता है पुराना दौर?
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि गोल्ड कंट्रोल एक्ट जैसा सख्त कानून दोबारा लागू करना मुश्किल है. आज का भारत 1960 के दशक वाला भारत नहीं है. लेकिन सरकार टैक्स और नियमों के जरिए गोल्ड इंपोर्ट को नियंत्रित करने की कोशिश जरूर कर रही है.
आम लोगों के लिए क्या मतलब?
अगर सोने पर टैक्स बढ़ता रहा तो आने वाले समय में ज्वेलरी खरीदना और महंगा हो सकता है. खासकर शादी-ब्याह के सीजन में इसका असर ज्यादा महसूस किया जाएगा. हालांकि सरकार का कहना है कि यह कदम देश की आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी हैं.
पुरानी बहस फिर शुरू
1968 का गोल्ड कंट्रोल एक्ट और 1991 के आर्थिक सुधार आज फिर चर्चा में है. एक तरफ सरकार विदेशी मुद्रा बचाने की कोशिश कर रही है, वहीं दूसरी तरफ लोग सोने को अब भी सबसे सुरक्षित निवेश मानते हैं. यही वजह है कि भारत में सोने को लेकर बहस शायद कभी खत्म नहीं होगी.
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