Tamil Nadu Delimitation Meeting: तमिलनाडु की राजनीति में परिसीमन के मुद्दे को लेकर एक बार फिर से सियासी हलचल तेज हो गई है। बताया जा रहा है मुख्यमंत्री विजय थलपति की ओर से बुलाई गई सर्वदलीय सांसदों की बैठक को बड़ा झटका लगा है। दरअसल बैठक में राज्य के सभी सांसदों की मौजूदगी की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन DMK और AIADMK समेत कई प्रमुख दलों के सांसदों ने इससे दूरी बनाने का फैसला किया है। ऐसे में, राज्य के कुल 57 सांसदों में से 37 सांसद बैठक में शामिल नहीं हुए, जबकि करीब 20 सांसदों के बैठक में शामिल होने की उम्मीद जताई गई।
जानकारी के अनुसार, यह बैठक संसद में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर तमिलनाडु का साझा रुख तैयार करने के उद्देश्य से बुलाई गई थी। जिसमें दक्षिण भारत के कई राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होने पर भविष्य में संसद में उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि तमिलनाडु में यह मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है।
बैठक से DMK ने बनाई दूरी
परिसीमन पर बुलाई गई इस बैठक में सबसे बड़ा झटका DMK के रुख से लगा है। पार्टी ने बैठक में शामिल नहीं होने का फैसला किया। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, DMK ने इस पहल को राजनीतिक कवायद बताया है और बैठक में हिस्सा लेने से इनकार किया है। जिसके बाद DMK का कहना है कि परिसीमन जैसे गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक विषय पर चर्चा के लिए केंद्र सरकार की ओर से स्पष्ट रोडमैप सामने आना जरूरी है। बता दें पार्टी पहले भी यह तर्क देती रही है कि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन करने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है।
DMK सांसद कनिमोझी लंबे समय से इस मुद्दे पर पार्टी का पक्ष सामने रखती रही हैं। उनका कहना है कि अगर परिसीमन का आधार केवल आबादी रखा गया तो दक्षिणी राज्यों की संसद में राजनीतिक ताकत कम हो सकती है। उन्होंने पहले भी कहा है कि तमिलनाडु जैसे राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण की सफलता की कीमत राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने के रूप में नहीं चुकानी चाहिए।
AIADMK समेत कई दलों ने भी किया बायकॉट
दरअसल केवल DMK ही नहीं, बल्कि AIADMK और कुछ अन्य दलों के सांसदों ने भी बैठक से दूरी बनाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, DMK के 30 सांसदों के अलावा AIADMK के 4 तथा DMDK, PMK और MNM के एक-एक सांसद ने बैठक में शामिल नहीं होने का फैसला किया। इस तरह कुल 37 सांसदों के बैठक से दूर रहने की बात सामने आई है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के सांसदों के बैठक में शामिल होने की उम्मीद रही। इनमें कांग्रेस के 12, VCK के 2, CPI के 2, CPI(M) के 2, MDMK का एक और IUML का एक सांसद शामिल बताया गया है।
बता दें की इस आंकड़े ने बैठक को लेकर राजनीतिक चर्चा और तेज कर दी है। जिस बैठक का उद्देश्य तमिलनाडु के सभी सांसदों को एक मंच पर लाकर परिसीमन के खिलाफ साझा रणनीति बनाना था, उसमें प्रमुख विपक्षी दलों की गैरमौजूदगी ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी कर दी है।

कनिमोझी ने बैठक पर उठाए सवाल
DMK सांसद कनिमोझी ने इस पहल को लेकर सवाल उठाए हैं। जिसमें उनका तर्क है कि जब केंद्र की ओर से परिसीमन को लेकर पूरी स्पष्टता नहीं है, तब इस तरह की बैठक का क्या उद्देश्य है। DMK पहले भी परिसीमन को लेकर केंद्र से स्पष्टता की मांग करती रही है।
कनिमोझी का कहना है कि दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है। यह राज्यों के राजनीतिक प्रभाव और संसद में उनकी आवाज से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है। उनका तर्क है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर केंद्र की नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू किया, उन्हें भविष्य में कम प्रतिनिधित्व के रूप में नुकसान नहीं होना चाहिए। उन्होंने पहले भी परिसीमन के मौजूदा तरीके पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि अगर प्रक्रिया न्यायसंगत नहीं है तो इसे टालने पर विचार किया जाना चाहिए।
कांग्रेस ने बैठक का समर्थन किया
बैठक में शामिल होने वाले दलों ने इसे तमिलनाडु के हितों से जुड़ा मुद्दा बताया है। जिसमें कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने बैठक का समर्थन करते हुए बहिष्कार करने वाले दलों पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि जो लोग तमिलनाडु के हितों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखते हैं, उन्हें इस तरह की बैठक में शामिल होना चाहिए।
कांग्रेस का मानना है कि परिसीमन के संभावित प्रभाव पर सांसदों के बीच चर्चा जरूरी है। पार्टी का तर्क है कि अगर राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ा कोई बड़ा फैसला आने वाला है तो तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों को अपनी राय रखने के लिए एक मंच पर आना चाहिए।
आखिर परिसीमन को लेकर इतनी चिंता क्यों?
परिसीमन का मतलब लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं तथा सीटों के प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण है। भारत में परिसीमन मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन से जुड़ा रहा है। जिसमें दक्षिण भारत के राज्यों की मुख्य चिंता यह है कि अगर भविष्य में संसद की सीटों का बंटवारा जनसंख्या के मौजूदा आंकड़ों के आधार पर होता है तो अपेक्षाकृत कम आबादी वाले दक्षिणी राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
तमिलनाडु इस बहस में सबसे मुखर राज्यों में रहा है। DMK और उसके नेताओं का कहना है कि राज्य ने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक विकास की नीतियों पर काम किया है। ऐसे में केवल जनसंख्या के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व तय करना उन राज्यों के लिए नुकसानदेह हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया है।
तमिलनाडु की राजनीति में बढ़ेगा टकराव?
बैठक के बहिष्कार के बाद तमिलनाडु की राजनीति में सत्तारूढ़ TVK और विपक्षी दलों के बीच टकराव बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। इसमें एक तरफ सरकार परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु के सांसदों का साझा रुख तैयार करने की कोशिश कर रही है, वहीं DMK ने इस पहल पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। हालिया राजनीतिक घटनाक्रम यह भी दिखाता है कि परिसीमन अब केवल संवैधानिक प्रक्रिया का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति में यह बड़ा चुनावी और क्षेत्रीय अधिकारों से जुड़ा विषय बन चुका है। DMK लगातार इसे दक्षिणी राज्यों के अधिकारों और संसद में उनकी आवाज से जोड़ती रही है।
ऐसे में अब सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री विजय थलपति विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने में सफल होंगे या परिसीमन का मुद्दा तमिलनाडु की राजनीति में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच एक और बड़े टकराव की वजह बनेगा। फिलहाल 37 सांसदों के बैठक से दूर रहने से यह साफ है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं होगा।



