CBSE Controversy: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) द्वारा शैक्षणिक सत्र 2025-26 के 12वीं कक्षा के परीक्षा परिणाम घोषित किए जाने के बाद देशभर में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच चर्चा तेज हो गई है. इस बार CBSE का 12वीं का पास प्रतिशत घटकर 85.2 प्रतिशत पर पहुंच गया, जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम माना जा रहा है. रिजल्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में छात्रों ने फिजिक्स, केमिस्ट्री, मैथ्स और बायोलॉजी जैसे विषयों में अपेक्षा से कम अंक मिलने को लेकर नाराजगी जताई. कई छात्रों और अभिभावकों ने कॉपी जांच में गड़बड़ी के आरोप लगाए और इसके लिए CBSE की नई डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली ‘ऑन स्क्रीन मार्किंग’ (OSM) को जिम्मेदार ठहराया. बढ़ते विवाद के बीच अब बोर्ड ने आधिकारिक बयान जारी कर पूरे मामले पर अपनी सफाई दी है.
सोशल मीडिया पर छात्रों का गुस्सा
रिजल्ट घोषित होने के बाद एक्स (पूर्व ट्विटर), फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर छात्रों ने लगातार पोस्ट करना शुरू कर दिया. कई छात्रों ने दावा किया कि उन्होंने परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन उन्हें उम्मीद से काफी कम अंक मिले. कुछ छात्रों ने यह भी कहा कि वे जेईई जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर चुके हैं, लेकिन CBSE बोर्ड परीक्षा में कम अंक आने से हैरान हैं. खासतौर पर फिजिक्स और केमिस्ट्री में कम मार्क्स को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठाए गए.
क्या है OSM सिस्टम?
CBSE ने इस साल पहली बार बड़े स्तर पर ‘ऑन स्क्रीन मार्किंग’ यानी OSM सिस्टम लागू किया है. इस तकनीक के तहत छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल रूप में परीक्षकों को भेजा जाता है. परीक्षक कंप्यूटर स्क्रीन पर ही उत्तरों की जांच करते हैं और अंक देते हैं. बोर्ड का कहना है कि इस व्यवस्था को लागू करने का उद्देश्य मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और सटीक बनाना था. इससे देशभर के परीक्षक एक समान तरीके से कॉपियों की जांच कर सकते हैं. CBSE के मुताबिक, डिजिटल मूल्यांकन से मानवीय त्रुटियों की संभावना कम होती है और हर छात्र को समान मूल्यांकन मानक का लाभ मिलता है.
CBSE ने आरोपों को बताया भ्रामक
सोशल मीडिया पर लगातार उठ रहे सवालों के बाद CBSE ने आधिकारिक बयान जारी कर आरोपों को खारिज किया. बोर्ड ने कहा कि OSM सिस्टम पूरी तरह सुरक्षित और पारदर्शी है तथा इसमें किसी प्रकार की धांधली की संभावना बेहद कम है. बोर्ड के अनुसार, डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली परीक्षकों की निगरानी को आसान बनाती है और उत्तर पुस्तिकाओं की जांच अधिक व्यवस्थित तरीके से होती है. CBSE ने यह भी कहा कि छात्रों के बीच कई तरह की भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है, जिससे भ्रम की स्थिति बन रही है.
स्टेप-वाइज मार्किंग पर बोर्ड का जोर
CBSE ने अपने बयान में सबसे ज्यादा जोर ‘स्टेप-वाइज मार्किंग’ प्रक्रिया पर दिया. बोर्ड ने स्पष्ट किया कि यदि किसी छात्र ने लंबे सवाल का अंतिम उत्तर गलत भी लिखा हो, लेकिन उसके शुरुआती स्टेप्स सही हों, तो उसे उन स्टेप्स के अंक जरूर दिए जाते हैं. बोर्ड के अनुसार, OSM सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि परीक्षक स्टेप-वाइज मार्किंग के नियमों का सख्ती से पालन करें. इससे किसी छात्र के साथ अन्याय होने की संभावना कम हो जाती है. CBSE का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर परीक्षकों को हर उत्तर के लिए निर्धारित मार्किंग स्कीम दिखाई जाती है, जिससे मूल्यांकन अधिक सटीक होता है.
पास प्रतिशत में गिरावट से बढ़ी चिंता
इस साल 12वीं का कुल पास प्रतिशत 85.2 प्रतिशत रहा, जो पिछले सात वर्षों में सबसे कम बताया जा रहा है. इसी कारण छात्रों और अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ गई. विशेषज्ञों का मानना है कि मूल्यांकन प्रणाली में बदलाव और परीक्षा पैटर्न में सख्ती इसका एक कारण हो सकता है. हालांकि बोर्ड ने अभी तक पास प्रतिशत में गिरावट के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया है.
साइंस स्ट्रीम के छात्रों में ज्यादा नाराजगी
सबसे अधिक शिकायतें साइंस स्ट्रीम के छात्रों की ओर से सामने आई हैं. फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में कम अंक आने को लेकर छात्रों ने सवाल उठाए हैं. कुछ छात्रों ने सोशल मीडिया पर अपनी मार्कशीट साझा करते हुए दावा किया कि उन्हें उम्मीद से बहुत कम नंबर मिले हैं. कई छात्रों ने री-चेकिंग और री-इवैल्यूएशन की मांग भी की. शिक्षकों का कहना है कि कई मामलों में छात्रों को अपने प्रदर्शन के अनुसार अंक नहीं मिलने का एहसास हो रहा है, जिससे असंतोष बढ़ा है.
बोर्ड ने जारी किया री-इवैल्यूएशन फ्रेमवर्क
CBSE ने छात्रों की चिंताओं को देखते हुए री-इवैल्यूएशन और स्क्रूटनी प्रक्रिया की जानकारी भी साझा की है. बोर्ड ने कहा कि जो छात्र अपने अंकों से संतुष्ट नहीं हैं, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर सकते हैं. री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया में छात्र पहले अपनी उत्तर पुस्तिका की कॉपी प्राप्त कर सकते हैं. इसके बाद वे प्रश्नवार पुनः जांच या अंक सत्यापन के लिए आवेदन कर सकते हैं. बोर्ड का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रखी गई है ताकि छात्रों को निष्पक्ष अवसर मिल सके.
डिजिटल मूल्यांकन क्यों जरूरी माना गया?
CBSE के अनुसार, हर साल लाखों छात्रों की उत्तर पुस्तिकाओं की जांच करना एक बड़ी चुनौती होती है. पारंपरिक तरीके में कॉपियों के ट्रांसपोर्ट, सुरक्षा और निगरानी जैसी समस्याएं आती थीं. OSM सिस्टम लागू होने के बाद कॉपियों को डिजिटल रूप में सुरक्षित तरीके से परीक्षकों तक पहुंचाया जाता है. इससे समय की बचत होती है और मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक नियंत्रित रहती है. बोर्ड का मानना है कि भविष्य में यह प्रणाली और अधिक प्रभावी साबित होगी.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नई तकनीक लागू होने पर शुरुआती दौर में भ्रम और असंतोष होना सामान्य है. हालांकि उनका कहना है कि यदि डिजिटल मूल्यांकन को सही तरीके से लागू किया जाए तो यह पारंपरिक व्यवस्था से अधिक पारदर्शी साबित हो सकता है. कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि छात्रों को मूल्यांकन प्रणाली के बारे में पहले से अधिक जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि गलतफहमियां कम हों.
छात्रों में मानसिक दबाव बढ़ा
कम अंक आने की शिकायतों के बाद कई छात्रों में मानसिक तनाव भी देखने को मिला. सोशल मीडिया पर छात्रों ने निराशा जाहिर करते हुए कहा कि बोर्ड परीक्षा के अंक उनके करियर और कॉलेज एडमिशन पर असर डाल सकते हैं. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि रिजल्ट के समय छात्रों को मानसिक सहयोग और सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है.
क्या बदल सकता है आगे?
CBSE आने वाले समय में OSM सिस्टम को और बेहतर बनाने के लिए नए बदलाव कर सकता है.बोर्ड तकनीकी खामियों और छात्रों की शिकायतों की समीक्षा कर सकता है. संभव है कि भविष्य में छात्रों और शिक्षकों के लिए विशेष जागरूकता कार्यक्रम भी चलाए जाएं, ताकि डिजिटल मूल्यांकन प्रक्रिया को बेहतर तरीके से समझाया जा सके.
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