Mamata Banerjee Setback: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए एक और बड़ी राजनीतिक चुनौती आई है। बताया जा रहा है की दिल्ली में विपक्षी गठबंधन INDIA की महत्वपूर्ण बैठक से पहले पार्टी को बड़ा झटका लगा है। जिसमें पश्चिम बंगाल से राज्यसभा सांसद सुखेंदु रॉय ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वहीं अभिनेत्री और राज्यसभा सांसद कोयल मलिक के भी इस्तीफा देने की अटकलें तेज हो गई हैं।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर कोयल मलिक भी इस्तीफा देती हैं तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए एक और बड़ा नुकसान साबित हो सकता है। जिसमें खास बात यह है कि कोयल मलिक केवल दो महीने पहले ही राज्यसभा पहुंची थीं और उन्होंने अभी तक सदन की किसी कार्यवाही में हिस्सा नहीं लिया है।
सुखेंदु रॉय के इस्तीफे से बढ़ी TMC की मुश्किलें
सुखेंदु रॉय तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं। उनके इस्तीफे ने पार्टी के भीतर चल रही असंतोष की खबरों को और मजबूत कर दिया है। राज्यसभा में पार्टी की रणनीति और संगठनात्मक मामलों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
उनके इस्तीफे के बाद राज्यसभा में TMC सांसदों की संख्या 13 से घटकर 12 रह गई है। विपक्षी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाली तृणमूल कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम काफी अहम माना जा रहा है।
राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस की स्थिति
वर्तमान में राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के प्रमुख सांसदों में डेरेक ओ’ब्रायन, सागरिका घोष, डोला सेन, सुष्मिता देव, ममता बाला ठाकुर, मोहम्मद नदीमुलहक, समीरुल इस्लाम, बाबुल सुप्रियो, राजीव कुमार, मेनका गुरुस्वामी, प्रकाश चिक बाराइक और कोयल मलिक शामिल हैं।
सुखेंदु रॉय के पद छोड़ने के बाद पार्टी की संख्या में कमी आई है। ऐसे में यदि कोयल मलिक भी इस्तीफा देती हैं तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए राजनीतिक और संसदीय दोनों स्तरों पर चिंता का विषय बन सकता है।
विधानसभा चुनाव के बाद बढ़ी बगावत
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव समाप्त होने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। पहले कई विधायक पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुलकर सामने आए और अब सांसदों के बीच भी नाराजगी की खबरें सामने आने लगी हैं। बताया जा रहा है कि पार्टी के दर्जनों विधायकों ने अलग गुट बना लिया है। इस गुट का दावा है कि कई सांसद भी उनके संपर्क में हैं। इससे ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती मिलने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
अभिषेक बनर्जी को लेकर उठ रहे सवाल
पार्टी में जारी असंतोष के पीछे सबसे बड़ा कारण अभिषेक बनर्जी को माना जा रहा है। जिसमें कुछ बागी नेताओं का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस की निर्णय प्रक्रिया पर अभिषेक बनर्जी का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
बागी नेताओं का कहना है कि पार्टी के पुराने नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा की जा रही है। यही वजह है कि संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है और कई नेता अलग रास्ता चुनने पर विचार कर रहे हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व ने इन आरोपों को खारिज किया है और कहा है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है।

नगर निकायों में भी दिख रहा असर
तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें केवल विधानसभा और संसद तक सीमित नहीं हैं। नगर निकायों में भी पार्टी को झटके लग रहे हैं। विभिन्न नगरपालिकाओं के कई पार्षदों ने हाल के दिनों में इस्तीफा दिया है।
चंदननगर, भाटपाड़ा, गारुलिया, हलीशहर, उत्तर बैरकपुर, कांचरापाड़ा और डायमंड हार्बर जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में पार्षदों के इस्तीफे की खबरें सामने आई हैं। इससे स्थानीय स्तर पर पार्टी संगठन कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का कहना है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा तो आगामी चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
INDIA गठबंधन की बैठक से पहले बढ़ा दबाव
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब विपक्षी गठबंधन INDIA की अहम बैठक होने वाली है। ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा रही हैं और ऐसे समय पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें उनके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती हैं।
विपक्षी एकता के प्रयासों के बीच तृणमूल कांग्रेस में टूट की खबरें राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। भाजपा समेत विपक्षी दल भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।
अब आगे क्या होगा?
ऐसे में फिलहाल सभी की नजरें कोयल मलिक के अगले कदम पर टिकी हुई हैं। यदि वह भी इस्तीफा देती हैं तो यह तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश माना जाएगा। वहीं पार्टी नेतृत्व लगातार यह दावा कर रहा है कि संगठन मजबूत है और किसी भी तरह का संकट नहीं है।
अब आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह केवल कुछ नेताओं की नाराजगी है या फिर तृणमूल कांग्रेस के भीतर कोई बड़ा राजनीतिक बदलाव आकार ले रहा है। फिलहाल सुखेंदु रॉय का इस्तीफा ममता बनर्जी के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है और इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है।
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