Mamata Banerjee TMC Splits: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा भूचाल आ गया है। बताया जा रहा है की विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) पहली बार अपने सबसे गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रही है। जिसमें पार्टी के 58 विधायकों ने बगावत का रास्ता अपनाते हुए अलग गुट बना लिया है और निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता चुन लिया है। जिससे इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है और पार्टी के भविष्य पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के लिए बता दें की राज्य विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बोस ने भी ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता दे दी है। इसके साथ ही उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का कार्यालय भी आवंटित कर दिया गया है। इस फैसले के बाद TMC के भीतर शक्ति संतुलन पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। ऐसे में आइए जानते हैं यहां पूरी खबर
ममता बनर्जी के पास सिर्फ 22 विधायकों का समर्थन
आपकी जानकारी के लिए बता दें की विधानसभा चुनाव में TMC ने कुल 80 सीटें जीती थीं, लेकिन अब 58 विधायक बागी गुट के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में ममता बनर्जी के समर्थन में केवल 22 विधायक बचे हैं। यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में पहली बार देखने को मिली है।
राजनीतिक एक्सपर्ट्स का मानना है कि पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर लंबे समय से असंतोष बढ़ रहा था। यही असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है और उसने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया है।
कैसे शुरू हुआ TMC का आंतरिक विवाद?
दरअसल तृणमूल कांग्रेस में विवाद उस समय बढ़ा जब विपक्ष का नेता चुनने के लिए भेजे गए प्रस्ताव पर फर्जी हस्ताक्षरों का आरोप लगा। इस मामले में ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा का नाम सामने आया है। पार्टी नेतृत्व ने दोनों नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें निष्कासित कर दिया। हालांकि, यह फैसला पार्टी के कई विधायकों को पसंद नहीं आया। इसी बीच वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम ने कोलकाता के मेयर पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद असंतुष्ट विधायकों ने एकजुट होकर ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नेता चुन लिया है। बागी विधायकों ने अपने समर्थन के हस्ताक्षर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे और उन्हें विपक्ष का नेता घोषित करने की मांग की। विधानसभा अध्यक्ष ने इस मांग को स्वीकार करते हुए ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक मान्यता दे दी।
अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल
राजनीतिक एक्सपर्ट्स के अनुसार, पार्टी में असंतोष की एक बड़ी वजह अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव भी माना जा रहा है। जिसमें कई विधायक और नेता पार्टी के फैसलों में उनकी भूमिका को लेकर नाराज बताए जा रहे हैं।
वहीं, बागी खेमे का मानना है कि पार्टी में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर हुई है और कुछ चुनिंदा लोगों के हाथ में निर्णय लेने की शक्ति केंद्रित हो गई है। यही कारण है कि कई विधायक खुले तौर पर नेतृत्व परिवर्तन की मांग कर रहे हैं। हालांकि, ऋतब्रत बनर्जी ने कहा है कि ममता बनर्जी का सम्मान पार्टी में बना रहेगा, लेकिन संगठन और राजनीतिक रणनीति से जुड़े फैसले अब नए नेतृत्व के तहत लिए जाएंगे।

ममता बनर्जी के सामने कौन-कौन से विकल्प?
1. कानूनी लड़ाई का रास्ता
बता दें ममता बनर्जी के पास पहला विकल्प कानूनी लड़ाई लड़ने का है। जिससे वह विधानसभा अध्यक्ष द्वारा ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता बनाए जाने के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकती हैं।
TMC के आधिकारिक गुट ने विपक्ष के नेता पद के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय का नाम प्रस्तावित किया था। ऐसे में पार्टी अदालत में यह दलील दे सकती है कि विधानसभा अध्यक्ष का फैसला नियमों के अनुरूप नहीं है। हालांकि, संसदीय मामलों में अदालतें आमतौर पर सीमित हस्तक्षेप करती हैं। फिर भी पिछले वर्षों में कई मामलों में अदालतों ने विधानसभा अध्यक्षों के फैसलों की समीक्षा की है।
2. बागी विधायकों को निष्कासित करना
दूसरा विकल्प यह है कि ममता बनर्जी बागी 58 विधायकों को पार्टी से औपचारिक रूप से निष्कासित कर दें। लेकिन यह फैसला भी जोखिम भरा साबित हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो TMC के विधायकों की संख्या घटकर केवल 22 रह जाएगी। इससे पार्टी विधानसभा में विपक्षी दल का दर्जा भी खो सकती है। इसके अलावा बागी विधायक चुनाव आयोग का दरवाजा खटखटाकर खुद को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित करने की मांग कर सकते हैं। यदि चुनाव आयोग उनके पक्ष में फैसला देता है तो पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न भी ममता बनर्जी के हाथ से निकल सकता है।
3. बागी नेताओं से समझौता
तीसरा और सबसे कठिन विकल्प बातचीत का है। ममता बनर्जी बागी विधायकों के साथ संवाद स्थापित कर पार्टी को टूटने से बचाने की कोशिश कर सकती हैं। हालांकि, यह रास्ता आसान नहीं माना जा रहा है। बागी नेताओं की नाराजगी सिर्फ संगठनात्मक मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे नेतृत्व में बड़े बदलाव की मांग भी कर सकते हैं।
कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि बातचीत होती है तो अभिषेक बनर्जी की भूमिका सबसे बड़ा मुद्दा बन सकती है। ऐसे में ममता बनर्जी को संगठन बचाने और परिवार आधारित नेतृत्व की आलोचनाओं के बीच संतुलन बनाना होगा।
TMC के अस्तित्व पर मंडरा रहा खतरा
तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल की राजनीति की सबसे प्रभावशाली पार्टियों में से एक रही है, लेकिन मौजूदा संकट ने पार्टी की एकता और भविष्य दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिससे यदि बागी गुट अपनी ताकत बनाए रखने में सफल रहता है तो आने वाले समय में TMC की राजनीतिक पहचान और चुनावी ताकत पर बड़ा असर पड़ सकता है। वहीं यदि ममता बनर्जी इस संकट को संभाल लेती हैं तो यह उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी वापसी मानी जाएगी।



