Russia Oil Tariff: रूस से कच्चा तेल खरीदने को लेकर अमेरिका और भारत के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है। बता दें अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस पर नए प्रतिबंधों और रूसी तेल-गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देने वाले विधेयक को मंजूरी दे दी है। अब यह कानून बनने के लिए राष्ट्रपति के पास जाएगा। ऐसे में आइए जानें यहां पूरी खबर
अमेरिका-रूस के बीच अभी भी अरबों डॉलर का व्यापार
रूस पर प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका और रूस (India Russia Oil Trade) के बीच व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अमेरिकी जनगणना ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में अमेरिका ने रूस से करीब 3.78 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जबकि रूस को करीब 58.27 करोड़ डॉलर का निर्यात किया। यानी दोनों देशों के बीच 2025 में कुल वस्तु व्यापार करीब 4.36 अरब डॉलर रहा। इससे साफ है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद रूस के साथ कुछ श्रेणियों में व्यापार जारी रहा। हालांकि इसे भारत की रूसी तेल खरीद के समान नहीं माना जा सकता, क्योंकि दोनों देशों के व्यापार की प्रकृति और लागू प्रतिबंध अलग-अलग हैं।
यूरोप भी अभी पूरी तरह रूसी गैस से अलग नहीं
रूस की ऊर्जा पर यूरोप की निर्भरता भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। यूरोपीय आयोग के अनुसार, 2025 में यूरोपीय संघ ने करीब 36 अरब घन मीटर रूसी गैस आयात की। यह कुल EU गैस आयात का करीब 12 फीसदी था। रूस से LNG और पाइपलाइन गैस का आयात भी जारी रहा। हालांकि यूरोपीय संघ ने रूसी ऊर्जा से दूरी बनाने के लिए समयबद्ध योजना बनाई है। नए नियमों के तहत रूसी LNG आयात को 2026 के अंत तक और पाइपलाइन गैस आयात को नवंबर 2027 तक खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।
क्या है रूस सैंक्शन बिल?
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 16 सितंबर 2026 को रूस से जुड़े व्यापक प्रतिबंध विधेयक को मंजूरी दी। रिपोर्टों के मुताबिक, यह कानून राष्ट्रपति को रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार दे सकता है। इसका सबसे बड़ा असर भारत और चीन जैसे देशों पर पड़ सकता है, जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते हैं। हालांकि 100 फीसदी टैरिफ लगाना अपने आप लागू नहीं होता; कानून राष्ट्रपति को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार देता है।
रूस के तेल का सबसे बड़ा खरीदार कौन?
ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र यानी CREA के अगस्त 2026 के विश्लेषण के अनुसार, दिसंबर 2022 से अगस्त 2026 के बीच रूस के कच्चे तेल निर्यात में चीन की हिस्सेदारी करीब 50 फीसदी रही। भारत करीब 37 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दूसरे बड़े खरीदारों में रहा। तुर्की और यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी करीब 5-5 फीसदी रही। यही वजह है कि रूस पर दबाव बनाने वाली अमेरिकी नीति का असर भारत और चीन पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए रूसी तेल क्यों अहम?
भारत लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों से कच्चा तेल खरीदता रहा है। रूस से मिलने वाला तेल कई मौकों पर अन्य विकल्पों की तुलना में आर्थिक रूप से आकर्षक रहा है। भारतीय रिफाइनरियां इस कच्चे तेल को पेट्रोलियम उत्पादों में बदलती हैं, जिनमें से कुछ का निर्यात भी किया जाता है।
रूसी तेल की बड़ी मात्रा अगर अचानक वैश्विक बाजार से हटती है तो सप्लाई और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि तेल की कीमत पर असर कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करता है, जैसे OPEC+ उत्पादन, वैश्विक मांग, मध्य पूर्व की स्थिति और शिपिंग लागत।
अमेरिका की नीति पर क्यों उठ रहे सवाल?
अमेरिकी नीति के आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि रूस के साथ कुछ व्यापारिक गतिविधियां जारी रहने के बावजूद भारत और चीन की रूसी ऊर्जा खरीद पर अतिरिक्त टैरिफ की धमकी क्यों दी जा रही है। दूसरी तरफ अमेरिकी नीति का तर्क यह है कि रूसी ऊर्जा की खरीद से रूस को राजस्व मिलता है और इससे यूक्रेन युद्ध के लिए उसकी आर्थिक क्षमता को समर्थन मिल सकता है। इसलिए विवाद केवल तेल खरीद तक सीमित नहीं है। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, रूस पर आर्थिक दबाव, वैश्विक व्यापार और अमेरिका की टैरिफ नीति जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं।
भारत के सामने क्या चुनौती है?
भारत के लिए चुनौती दो स्तरों पर है। पहला, उसे अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों के लिए पर्याप्त और किफायती कच्चा तेल उपलब्ध रखना है। दूसरा, अमेरिका जैसे बड़े व्यापारिक साझेदार के साथ टैरिफ और व्यापार वार्ता को संभालना है। फिलहाल रूस से तेल खरीद पर अमेरिका की नई कार्रवाई भारत के लिए एक बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक मुद्दा बन सकती है। आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राष्ट्रपति ट्रंप इस कानून का इस्तेमाल किस तरह करते हैं और भारत-अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ता पर इसका क्या असर पड़ता है।
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